जयपुर
राजस्थान का गर्वीला इतिहास आज भी हर राजस्थानी में आगे बढऩे का जोश भर देता है। कला-संस्कृति हो, या व्यापार। चाहे खेल की बात करो या खेती की राजस्थानी किसी से कम नहीं हैं।
इंग्लैण्ड के विख्यात कवि किप्लिंग ने लिखा था, 'दुनिया में अगर कोई ऐसा स्थान है, जहां वीरों की हड्डियां मार्ग की धूल बनी हैं तो वह राजस्थान कहा जा सकता है।' सच ही तो है। इन वीरों की शौर्य गाथा आज भी हमारी नसों में उबाल भरने के लिए काफी हैं। वीर तो वीर, यहां की वीरांगनाएं भी अपनी माटी के लिए कुर्बानी देने में नहीं झिझकीं। शौर्य और साहस ही नहीं बल्कि हमारी धरती के सपूतों ने हर क्षेत्र में कमाल दिखाकर देश-दुनिया में राजस्थान के नाम को चांद-तारों सा चमका दिया।
इसलिए कहलाती हे वीरों की धरती
राजस्थान की धरती पर रणबांकुरों ने जन्म लिया है। यहां वीरांगनाओं ने भी अपने त्याग और बलिदान से मातृभूमि को सींचा है। यहां धरती का वीर योद्धा कहे जाने वाले पृथ्वीराज चौहान ने जन्म लिया, जिन्होंने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी को पराजित किया।
कहा जाता है कि गौरी ने 18 बार पृथ्वीराज पर आक्रमण किया था जिसमें 17 बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा था। जोधपुर के राजा जसवंत सिंह के 12 साल के पुत्र पृथ्वी ने तो हाथों से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था।
राणा सांगा ने सौ से भी ज्यादा युद्ध लड़कर साहस का परिचय दिया था। पन्ना धाय के बलिदान के साथ बुलन्दा (पाली) के ठाकुर मोहकम सिंह की रानी वाघेली का बलिदान भी अमर है। जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए वे उन्हें अपनी नवजात राजकुमारी की जगह छुपाकर लाई थीं। इन सब के अलावा आज भी राजस्थान की ये धरती भारतीय सैना को बड़ी संख्या में सैन्यकर्मी उपलब्ध कराती है।
एटमी ताकत का गर्व
जैसलमेर का पोकरण लाल पत्थरों से निर्मित दुर्ग के कारण मशहूर था। अब इसकी पहचान भारत की एटमी ताकत की भूमि के रूप में भी है। यहां पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण 18 मई, 1974 को किया गया था। इसके बाद 11 और 13 मई 1998 को भी यहां परीक्षण किए गए।





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