कोटा. लोकसभा चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो गया है। सभी दल चुनाव मैदान में जा चुके है या जाने को तैयार है। पिछले चुनाव में पीएम मोदी और भाजपा ने चुनाव प्रचार को एक नया स्वरूप दे दिया था। अब कांग्रेस समेत बाकी पार्टी भी उसी राह पर है। यह माना जा रहा है कि इन चुनावों में प्रचार-प्रसार पर होने वाला खर्च 2014 के आमचुनावों के मुकाबले लगभग दोगुना होगा। यानि करीबन 30 हजार करोड़ रूपए । अगर यह आंकड़ा पार हो जाता है तो यह विश्व इतिहास में सबसे महंगा चुनाव होगा। लेकिन एक दौर वो भी था जब कम संसाधन होने के बावजूद भी चुनाव लड़े और जीते जाते थे। ऐसा ही एक चुनाव था 1977 में राजस्थान विधानसभा की छबड़ा सीट के लिए उपचुनाव। 1977 में जनसंघ और सहयोगी दलों ने चुनाव जीत लिया था और बड़ी कमशमकश के बाद सभी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि भैरोसिंह शेखावत को मुख्यमंत्री बनाया जाए।
छबड़ा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी बताते हैं कि 1977 में भैरोसिंह शेखावत पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन वे विधायक नहीं थे। उनके लिए मेरे पिता प्रेम सिंह सिंघवी ने छबड़ा सीट से त्याग पत्र दिया था। जब भैरोसिंह शेखावत इस सीट पर उप चुनाव लड़ा तो अटल बिहारी वाजपेयी उनके लिए चुनाव प्रचार करने के लिए छीपाबड़ौद गए थे। उस समय वे मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री थे। छीपाबड़ौद में उन्होंने आम सभा को संबोधित किया था और कस्बे में रोड शो किया था। शेखावत की इस चुनाव में जीत हुई थी। तब उनके प्रचार प्रसार के लिए बमुश्किल दो जिप्सी का बंदोबस्त हो पाया था।
राजनीति में 'बाबोसाÓ
भैरों सिंह शेखावत ने 1952 में राजनीति में प्रवेश किया। 1952 से 1972 तक वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। 1967 के चुनाव में भारतीय जनसंघ और सहयोगी स्वतंत्र पार्टी बहुमत के नजदीक तो आई लेकिन सरकार नहीं बना सकी। 1974 से 1977 तक उन्होंने राज्यसभा सदस्य के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। 1977 से 2002 वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। 1977 में 200 में से 151 सीटों पर कब्जा करके उनकी पार्टी ने चुनाव में जीत दर्ज की और वह राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 1980 तक अपनी सेवाएं दीं। 1980 में भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के विघटन के बाद वह बीजेपी में शामिल हो गए और 1990 तक नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई।





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