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Election 2019 : ' दल-बदल ऑफ द इयर' से कशमकश में कांग्रेस, जिस पर खेलना था दांव अब वो ही चुनौती दे रहे...

कोटा. हाड़ौती की दोनों सीटों पर प्रत्याशियों के चयन के लिए राजनीतिक दलों में बैठकों का दौर शुरू हो चला है। कोटा-बूंदी सीट पर नाम तय होने की खबरें भी आ गई लेकिन इस सीट पर कांग्रेस की कशमकश उस रोज ही बढ़ गई थी जब विधानसभा चुनावों में टिकट न मिलने पर नाराज होकर पूर्व सांसद और राजपरिवार के सदस्य इज्यराज सिंह कांग्रेस का दामन छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे । इस घटनाक्रम ने हाड़ौती समेत पूरे प्रदेश में सुर्खियां बटौरी थी। दरअसल इज्यराज सिंह पीपल्दा विधानसभा सीट से विधानसभा चुनावों के लिए टिकट चाह रहे थे लेकिन पार्टी ने उनकी मांग को ठुकरा दिया था। यह माना जा रहा था कि अगर सिंह पार्टी नहीं छोड़ते तो उन्हें ही कांग्रेस की तरफ से लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया जाता।

हाड़ौती में है मजबूत पकड़
पूर्व राजपरिवार का नाता पहले जनसंघ और फिर लंबे समय तक कांग्रेस से रहा। कोटा के पूर्व महाराव दो बार झालावाड़ लोकसभा सीट से सांसद रहे हैं। राजपरिवार से जुड़े होने की वजह से इज्यराज सिंह की हाड़ौती में ग्रामीण अंचलो में खासी पकड़ भी मानी जाती है। अब इज्यराज सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस के लिए लोकसभा में मजबूत प्रत्याशी का चयन करना एक बड़ी चुनौती साबित होगा।

बड़ा लम्बा है दल-बदल का इतिहास
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी अपने समय में देश के शीर्ष राजनेताओं में शुमार किए जाते थे। वे लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे। डॉ. मुखर्जी भी आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू की सरकार में मंत्री थे, लेकिन दोनों ही नेताओं को वैचारिक मतभेदों के चलते बाद में कांग्रेस से अलग होना पड़ा। उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने भी आजादी के बाद दूसरे चुनाव में पार्टी बदलकर कांग्रेस का दामन थामा था ।

राजीव सरकार ने बनाया कानून
तो 1967 में दल-बदल के जरिए राज्यों में शुरू हुआ सरकारें गिराने-बनाने-बचाने का खेल बाद के वर्षों में लगातार विकसित होता गया। इस खेल को समाप्त करने के लिए पहली बार उस समय गंभीरतापूर्वक सोचा गया, जब आठवें आम चुनाव में कांग्रेस ने राजीव गांधी की अगुवाई में तीन चौथाई से अधिक बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। राजीव गांधी की सरकार ने दल-बदल पर रोक लगाने के लिए 52वें संविधान संशोधन के जरिए दल-बदल विरोधी कानून संसद में पारित कराया। हालांकि इस कानून को पारित कराने को लेकर राजीव गांधी की नीयत पर सवाल भी उठे। कई लोगों ने इसे उनके 450 से अधिक सांसदों के भारी-भरकम बहुमत की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम माना।



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