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Garib Nawaz Urs 2019: यहां बादशाह से फकीर तक देते हैं हाजिरी, खाली हाथ नहीं लौटता कोई

अजमेर.

सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में बुलंद दरवाजे पर र शाम शान-ओ-शौकत से उर्स का झंडा चढ़ाया जा चुका है। इसके साथ ही गरीब नवाज के 807वें उर्स की औपचारिक शुरुआत हो गई है। दरगाह में 800 साल से बादशाह से फकीर तक हाजिरी देते आ रहे हैं। कोई खाली हाथ नहीं लौटा है।

उर्स विधिवत रूप से रजब का चांद दिखाई देने पर 7 या 8 मार्च से शुरू होगा। हाल में झंडे का जुलूस निकाला गया। को असर की नमाज के बाद लंगरखाना गली स्थित गरीब नवाज गेस्ट हाउस से रवाना हुआ। जुलूस में भीलवाड़ा से आए लाल मोहम्मद गौरी परिवार के लोग सिर पर चादर लेकर चल रहे थे। साथ में दरगाह की शाही चौकी के कव्वाल कलाम पेश कर रहे थे वहीं बैंड बाजे पर सूफियाना धुन बजाई जा रही थी। जुलूस के रवाना होते ही अकीदतमंद में झंडा चूमने की होड़ मच गई। झंडे का जुलूस दरगाह बाजार होते हुए दरगाह में स्थित सबसे बड़े बुलंद दरवाजे तक पहुंचा। यहां फकरूद्दीन गौरी ने सैयद मारूफ अहमद की सदारत में झंडा पेश कर रस्म अदा की।

उल्टे पांव चलकर आया था अकबर
मुगल बादशाह अकबर की दरगाह में गहरी आस्था थी। उसने अपने पुत्र सलीम की पैदाइश के लिए यहां दुआ मांगी थी। मन्नत पूरी होने के बाद वह आगरा से अजमेर तक उल्टे पांव चलकर आया था। इसका सबूत हर कोस पर बनी कोस मीनार है।

हुए थे शाहजहां के दो पुत्र
मुगल शहंशाह शाहजहां के दो पुत्र शुजा और मुराद अजमेर में ही पैदा हुए थे। दरगाह के निकट एक इमारत में वह स्थान अब तक बना हुआ है। शाहजहां की पुत्री रोशनआरा और जहांआर ने अपने बालों से दरगाह की धुलाई भी की थी।

 



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