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Kota-Bundi : 67 साल में 7 बार कमल खिला तो 7 बार हाथ को मिला जनता का साथ, जानिए इस सीट का पूरा इतिहास...

चम्बल किनारे बसा हुआ शहर कोटा आज दुनिया भर में कोचिंग फैक्ट्री के नाम से जाना जाता है। आजादी के बाद बनी इस लोकसभा सीट पर वैसे तो दोनों ही पार्टियों के प्रतिनिधि जीतकर संसद जाते आए हैं लेकिन जनसंघ के जमाने से ही यहां पहले जनता पार्टी और अब भाजपा का दबदबा रहा है। कोटा और बूंदी जिले इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। 1952 में हुए पहले चुनाव में देशभर में कांग्रेस की लहर होने के बावजूद यहां राम राज्य परिषद के प्रत्याशी रामचंद्र सेन ने जीत दर्ज की थी। कुल 16 चुनावों में 7 बार भाजपा 7 बार कांग्रेस, एक बार जनसंघ व एक बार राम राज्य परिषद की जीत हुई।

फिलहाल हाड़ौती का जो सियासी माहौल है, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि भिड़ंत दिलचस्प होने वाली है । भाजपा पर 2014 की जीत को दोहराने का दबाव है वहीं कांग्रेस के सामने भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में सेध लागने की बड़ी चुनौती होगी।

2014 का जनादेश
कोटा दक्षिण के तत्कालीन भाजपा विधायक ओम बिरला ने 2014 में कोटा-बूंदी से लोकसभा चुनाव लड़ा और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी और पूर्व राजपरिवार के सदस्य इज्यराज सिंह को भारी मतों से हराया था। इस चुनाव में ओम बिरला को 644,822 मत मिले थे, जबकि कांग्रेस के इज्यराज सिंह को 444,040 वोट मिले थे ।

सामाजिक ताना-बाना
लोकसभा चुनाव 2014 के मुताबिक कोटा-बूंदी में कुल 17, 06,627 वोटर्स थे । यहां ब्राह्मण, राजपूत, मीणा और गुर्जर मतदाताओं का खासा प्रभाव है।

कोटा -बूंदी लोकसभा सीट का गठन 2008 में किया गया था, इससे पहले यह क्षेत्र कोटा के नाम से ही जाना जाता था। इस सीट पर कांग्रेस को 1962, 1967, 1971, 1984, 1998 और 2009 में जीत मिली थी । लेकिन बीजेपी का कमल यहां पहली बार 1980 में खिला।
मोदी लहर में पिछली बार यहां पार्टी की बंपर जीत हुइई। जीत भी ऐसी मिली कि यहां से तत्कालीन सांसद और पूर्व राजपरिवार के सदस्य को करारी हार का सामना करना पड़ा।

 



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