शंकर कलाल/सेमारी. सेमारी कस्बे में लोहार समाज के लोगों द्वारा बनाए गए ढोल आसपास क्षेत्र सहित गुजरात वागड़ तक के गांवों में बिकते हैंं। होली के त्योहार पर गेर नृत्य ढोल व कुण्डी की थाप पर ही खेला जाता है। सेमारी के अलावा आसपास कहींं भी ढोल नहींं बनाये जाते हैं। होली पर ढोल की बढ़ती मांग को लेकर जनवरी महीने से ही यहांं ढोल बनाने का काम शुरू हो जाता है व मांग के अनुसार आस पास के गांवों सहित खेरवाड़ा बावलवाडा सहित झाड़ोल फलासिया गुजरात के सीमाई क्षेत्रो में आपूर्ति की जाती है। उसके बावजूद भी ग्राहक सेमारी ढोल खरीदने आते हैंं। यहांं 12 पाटी व 16 पार्टी के ढोल की ज्यादा मांग रहती है कई बार तांबे के ढोल भी ग्राहकों की मांग पर बनाये जाते हैंं। ये कला इनके पूर्वजोंं की देन है जिससे इनके वर्ष भर की रोजी रोटी चलती है। वर्षोंं पूर्व ढोल बनाने में इतनी मजदूरी थी कि लोहार समाज का पूरा परिवार तीन महीने दिन रात इस व्यवसाय में लगा रहता था। वर्तमान में मशीनरी ने इनका काम कई गुना आसान कर दिया है । कई बार मांग अधिक होने से ढोल कम पड़ जातेे हैं। ऐसे में ग्राहक सेमारी में पड़ाव डालकर हाथों हाथ ढोल बनवाकर ले जाते हैंं। आदिवासी परिवार का पसंदीदा वाद्य यंत्र होने के साथ ही आपात स्थिति में शस्त्र का काम भी ढोल ही करता है। जब भी कोई विपदा आती है लगातार एक ही आवाज में ढोल बजने की आवाज से जहाँ तक ढोल की आवाज पहुंंचती है लोग अपने सारे काम छोड़कर हाथों में जो भी हथियार मिले लाठी तलवार सरिया ले कर तत्काल एकत्रित हो जाते हैंं। कहा जाता है कि पुत्रोंं के बंंटवारे में भी ढोल दिये जाते हैंं। ढोल पर खाल चढ़ाने के कार्य की मांग को लेकर उदयपुर डबगर समाज के सोहन लाल ने भी पिछले पांच वर्ष पूर्व सेमारी में व्यवसाय शुरू किया जिससे लोहार ढोल बनाकर डबगर से पूरा तैयार करवा कर बेचते हैंं।





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