रणवीर सिंह सोलंकी, खाचरियावास.
कस्बे में गणगौर का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। 200 साल पुरानी ईसर गणगौर की लकड़ी की प्रतिमा आज भी पहले की तरह ही है। राजा महाराजाओं के राज परिवार ने ईसर गणगौर की प्रतिमा का स्वरूप दिया था। दो दिन सवारी निकालने के बाद दोनों ही प्रतिमाओं को कवर लगाकर ऊनी वस्त्रों में लिपेटकर सुरक्षित रखा जाता है, जिससे इसका मूल स्वरूप खराब ना हो सके। रियासत काल के समय से ही गणगौर की सवारी 2 दिन निकलती है। पहले दिन गढ़ से रवाना होकर मुख्य बाजार गणगौरी चौक में ईसर गणगौर की सवारी को विराजमान किया जाता है जहां नवविवाहिता सहित महिलाएं पूजा अर्चना करती हैं। दूसरे दिन सुबह गढ़ से सवारी रवाना होकर चिन्हित घर-घर जाकर वापस गढ़ के सामने मैदान पर विराजमान होती हैं, जहां बोलावणी के मेला भरता है।पहले दिन लाल रंग की पोशाक धारण कर नगर भ्रमण करवाया जाता है। दूसरे दिन पीली पोशाक धारण करवाकर नगर भ्रमण करवाया जाता है। आज भी राजघराने की परंपरा के अनुसार शाही लवाजमे के साथ गणगौर की सवारी निकाली जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि ईसर गणगोर की प्रतिमा रियासत काल के दौरान मेड़ता से लाई गई थी। जिसे देखने आज भी आसपास के दर्जनों गांवों के काफी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
आठ को निकलेगी शाही सवारी
गणगौर का पारंपरिक पर्व 8 अप्रेल को मनाया जाएगा। मेला समिति के अध्यक्ष डी पी सोलंकी ने बताया कि गणगौर मेले की ऐतिहासिक सवारी निकालने की तैयारियां शुरू कर दी है। गढ़ के सामने स्थित मेला मैदान में पेड़ों पर काफी संख्या में मधुमक्खियों के छत्ते लगे हैं। मेला आयोजन के दिन गढ़ में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर जीण माता को भोग लगाकर धोक लगाई जाती है जिससे मेला शांतिप्रिय संपन्न हो सके। वहीं झुंझार जी महाराज के मंदिर पर नारियल चढ़ाया जाता है।
ऐसे सहेजते हैं प्रतिमाओं को
गणगौर निकालने वाले सदस्यों ने बताया की ईसर-गणगौर की प्रतिमा लकड़ी की बनी है। दोनों प्रतिमाओं को लकड़ी और लोहे के बने जालिनुमा कवर लगाकर ऊनी वस्त्र से ढंककर लकड़ी के बक्से में रखा जाता है। ईसर की 40 वर्षों से लगातार एक ही वस्त्र पहनाया जाता है। ईसर को बाघा व अंगरकी पहनाकर सिर पर पगड़ी व किलंगी लगाई जाती है। वहीं गणगौर को हर बार नवविवाहिताएं अपनी ओर से पोशाक पहनाती हैं। वहीं दोनों ही प्रतिमाओं को कृत्रिम गहनों से सजाया जाता है। वहीं बोलावनी मेले के आयोजन के पश्चात शाम को विधिवत रूप से गढ़ में ईसर-गणगौर के फेरे भी करवाए जाते हैं। रियासत काल के दौरान ही गणगौर व ईसर दोनों ही प्रतिमाओं को ऐसा रंग करवाया हुआ है जो आज भी 200 साल पुराना होने के बाद भी वैसा का वैसा ही है।





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