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लोकसभा चुनाव 2019: इस बार सियासी क्षत्रप किंग होंगे या किंगमेकर

नई दिल्‍ली। लोकसभा चुनाव को लेकर सियायी दंगल चरम पर है। राष्‍ट्रीय, राज्‍यस्‍तरीय व स्‍थानीय क्षत्रपों के बीच जीत का परचम लहराने को लेकर तलवारें खिच चुकी हैं। लेकिन चुनाव को लेकर अभी तक जो तस्‍वीर उभरकर सामने आई हैं उसमें इस बात को बल मिला है कि एक बार फिर नई सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला हो सकता है। यानि सियासी क्षत्रप इस बार खुद किंग बन सकते हैं या किंगमेकर की भूमिका निभाने की स्थिति में होंगे।

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राज्‍यवार सियासी क्षत्रप

सियासी क्षत्रप (खास भौगोलिक क्षेत्र) में निजी प्रभाव रखने वाले राजनेता हर राज्‍य में हैं। लेकिन यहां पर हम प्रमुख सियासी क्षत्रपों की बात करें तो उत्‍तर प्रदेश में मायावती, अखिलेश यादव, अजीत सिंह, महाराष्‍ट्र में शरद पवार, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में तेजस्‍वी यादव, राजेश रंजन (पप्‍पू यादव) उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी, तमिलनाडु में ओ पनीरसेलवम, ई पलानीसामी, एमके स्‍टालिन, ओडिशा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और जगन मोहर रेड्डी, तेलंगाना में के चद्रशेखर राव, पंजाब में सुखबीर सिंह बादल, दिल्‍ली में अरविंद केजरीवाल, जम्‍मू-कश्मीर में फारूक अब्‍दुल्‍ला, उमर अब्‍दुल्‍ला, महबूबा मुफ्ती व अन्‍य का नाम उभरकर सामने आता है।

मैजिक नंबर

सियासी क्षत्रप प्रभाव वाले राज्यों से निर्वाचित होने वाले लोकसभा सीटों की संख्या 332 है। लोकसभा के लिए कुल निर्वाचित होने वाले सांसदों की संख्या 543 है। इस लिहाज से जिसके पास 272 सांसदों का समर्थन होगा वो सरकार बना सकेगा। त्रिशंकु संसद की स्थिति में सीएम ममता बनर्जी, यूपी की पूर्व सीएम व बसपा प्रमुख मायावती, पूर्व केंद्रीय मंत्री व एनसीपी प्रमुख शरद पवार, सीएम नवीन पटनायक, आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू व तेलंगाना के सीएम केसीआर या तो खुद किंग बनने की स्थिति में होंगे या किसी को भी प्रधानमंत्री बनाने की स्थिति में होंगे। आपको बता दें कि चौधरी चरण सिंह, एचडी देवेगौडा और इंद्र कुमार गुजराल त्रिशंकु संसद की वजह से ही पीएम बनने में कामयाब हुए।

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सीटों की संख्‍या के लिहाज से सियासी क्षत्रप वाले प्रमुख राज्‍य

यूपी - 80, महाराष्‍ट्र - 48, पश्चिम बंगाल - 42, बिहार - 40, तमिलनाडु - 39, आंध्र प्रदेश - 25, ओडिशा - 21, तेलंगाना - 17, पंजाब - 13, दिल्‍ली - 7 आदि।

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क्षेत्रीय दलों ने की अपनी जगह पक्‍की

इन सियासी समीकरणों को देखते हुए क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह लगभग पक्की कर ली है। एनडीए गठबंधन में करीब 40 से ज्‍यादा पार्टियां हैं तो यूपीए में 20 से ज्‍यादा छोटी-बड़ी पार्टियां जुड़ी हुई हैं। बता दें कि पिछले सात में से छह लोकसभा चुनावों के बाद क्षेत्रीय दल नई सरकार के गठन में किंगमेकर की भूमिका निभा चुके हैं।

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औसतन 160 से 210 के बीच रही सांसदों की संख्‍या

पिछले सात लोकसभा चुनाव में वाम दलों समेत क्षेत्रीय दलों के खाते में औसतन 160 से 210 सीटें आईं। छह बार इनके समर्थन के बिना केंद्र में सरकार नहीं बन सकी। विगत तीन दशक में 2014 का लोकसभा चुनाव ही सिर्फ अपवाद है जब पहली बार खुद के दम पर केंद्र में भाजपा की सरकार बनी।

चुनाव दर चुनाव क्षेत्रीय दलों की स्थिति :

- 1991 में वाममोर्चा सहित क्षेत्रीय दलों को करीब 170 सीटें मिली थीं।
- 1996 में वाममोर्चा समेत क्षेत्रीय दलों को करीब 163 सीटें मिली थीं।
- 1998 में वाममोर्चा समेत क्षेत्रीय दलों को करीब 178 सीटें मिली थीं।
- 1999 में क्षेत्रीय दलों को करीब 200 सीटें मिली थीं।
- 2004 में लगभग 200 के करीब सीटें क्षेत्रीय दलों को मिली थीं।
- 2009 में 225 से ज्‍यादा सीटें क्षेत्रीय दलों को मिलीं।
- 2014 में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत (282) सीटें मिलीं।

 

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