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जालोर में 30 तारीख से इस संकट से करना होगा सामना

जालोर. नर्मदा परियोजना में 8 दिन बाद क्लोजर लिया जाएगा, जिसके बाद परियोजना से जालोर शहर समेत अन्य गांव कस्बों को पानी नहीं मिलेगा। लेकिन इस हकीकत का दूसरा पहलू यह भी है कि क्लोजर से पहले ही शहर और तमाम गांव कस्बों में पेयजल संकट गहराने लग गया है। हालात यह है कि अभी से ही सप्लाई का शैड्यूल प्रभावित हो चुका है और विभागीय अधिकारी भी दबे स्वर में इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। सीधे तौर पर गुपचुप में ही विभाग को अपना शैड्यूल 48 की बजाय 72 घंटे करना पड़ रहा है। ऐसे में संभव है कि 10 दिन में क्लोजर से हालात और भी बिगड़ेंगे। मामला इसलिए भी खास है कि इससे पूर्व भी जो क्लोजर लिए गए हैं, वे निर्धारित अवधि से अधिक दिन तक रहे। अभी गर्मी का मौसम है तो पानी की मांग भी बढ़ी है तो यदि क्लोजर की अवधि अधिक दिनों तक रही तो पानी के लिए इंतजार और भी ज्यादा बढ़ सकता है।
स्टॉक के निर्देश, लेकिन ऐसा संभव नहीं
कलक्टर महेन्द्र सोनी ने सभी संबंधित अधिकारियों को गुजरात द्वारा मुख्य नर्मदा नहर में 30 अप्रेल से 10 मई तक क्लोजर से संभावित हालातों को लेकर विशेष निर्देश जारी किए है। उन्होंने संभावित हालातों को देखते हुए पेयजल के लिए पानी के उचित मात्रा में स्टॉक के निर्देश जारी किए हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा संभव नहीं है। सीधे तौर पर जालोर शहर की पेयजल आपूर्ति ट्यूबवैल पर ही निर्भर करेगी और आपूर्ति को लेकर पूर्व में स्टॉक करने के लिए अधिक क्षमता का टैंक तक उपलब्ध नहीं है। नर्मदा परियोजना के एफआर प्रोजेक्ट में भी 21 दिन के पानी के स्टॉक के लिए आरडब्ल्यूआर बनना था, लेकिन वह भी अधूरा पड़ा है। ऐसे में जैसे ही नर्मदा परियोजना में पानी की आवक बंद होगी। आपूर्ति का बोझ ट्यूबवैलों पर ही पड़ेगा।
गर्मी में क्लोजर समझ से परे
पिछले तीन साल की बात करें तो परियोजना से जब से पानी मिलने लगा है लगातार हर बार गर्मी के मौसम में या मार्च अंत या अपे्रल माह में ही क्लोजर लिया जा रहा है। सीधे तौर पर गर्मी के मौसम में पानी की जरुरत बढ़ती है तो क्लोजर होने पर सप्लाई का शैड्यूल प्रभावित होने के साथ साथ जल संकट भी गहराता है। लगातार इन हालातों के बाद भी गर्मी के मौसम में क्लोजर को लेकर आपत्ति न तो प्रशासनिक स्तर से न ही राजनीतिक स्तर से उठाई जा रही है। मामले का दूसरा पक्ष यह है कि यदि क्लोजर गर्मी की बजाय सर्दी के मौसम में लिया जाए तो बेहतर है। बारिश के मौसम में क्लोजर संभव नहीं होता क्योंकि बारिश के दौरान पानी का नेचुरल फ्लो भी होता है।
स्थायी समाधान जरुरी
नर्मदा परियोजना से संबंधित मरम्मत समेत अन्य कार्य के लिए विभागीय स्तर पर भविष्य में भी क्लोजर लिए जाएंगे और इसी तरह के हालात बनते रहेंगे। इसक ेलिए विभागीय और प्रशासनिक स्तर की अनदेखी जिम्मेदार है। प्रोजेक्ट में इस समस्या के समाधान के लिए रॉ-वॉटर रिजर्वायर शामिल था। जिसमें बड़ी मात्रा में पानी का स्टॉक संभव है। लेकिन 281 गांव कस्बों से जुड़े इस प्रोजेक्ट में आरडब्ल्यूआर जरुरी होते हुए भी इसे लगातार नजर अंदाज ही किया जा रहा है। नतीजतन क्लोजर होते ही परियोजना से सप्लाई बंद हो जाती है।
इनका कहना
३० अपे्रल से क्लोजर लिया जा रहा है। इस अवधि में सप्लाई पूरी तरह से बंद रहेगी। इस संबंध में विभागीय स्तर पर भी सूचित किया जा चुका है।
गिरीश लोढ़ा, मुख्य अभियंता, नर्मदा परियोजना



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