उदयपुर/ मेनार. पृथ्वी दिवस के तौर पर आज एक अनूठा आयोजन है। पर्यावरण संरक्षण के समर्थन में २२ अप्रेल को इसे मनाया जाता है। अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में इसकी स्थापना की थी। अब 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष इसे मनाया जाता है। उत्तरी गोलाद्र्ध में वसंत और दक्षिणी गोलाद्र्ध में शरद का मौसम है। पृथ्वी को संरक्षण प्रदान करने के लिए और सारी दुनिया से इसमें सहयोग और समर्थन करने के लिए पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। समुदायों ने पृथ्वी सप्ताह का समर्थन करते हुए पूरे सप्ताह विश्व के पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर पृथ्वी को बचाने के लिए अनुकरणीय कदम उठाने का फैसला लेते हैं। वही संकल्प लेकर इसे बचाने के नित नए प्रयास करते हैं।
उदयपुर जिले का बर्ड विलेज मेनार सदियों से पृथ्वी सरक्षंण में अग्रणी रहा है । यहां के ग्रामीण सदियों से प्रकृति का सरक्षंण करते आए हैं। इस गांव में सदियों से वृक्ष लगाने की अनूठी परंपरा विद्यमान है। तेरह वर्ष पहले तालाब निर्माण के दौरान पेड़ लगाने की परम्परा शुरू हुई। मेनार कस्बे में पिछले कई वर्षों से सार्वजनिक जगह, तालाबों की पाल और खेतों में आम का वृक्ष एवं अन्य पेड़-पौधे लगाने की परंपरा बरकरार है। करीब हर परिवार के घर का सदस्य तालाब की पाल पर एक आम का पेड़ लगाता है। साथ ही उसे देखभाल की जिम्मेदारी भी लेता है। यही वजह है कि आज इस गांव के दोनों तालाब की पाल पर आम के सैकड़ों पेड़ लगे हैं। बड़े पेड़ों की तादाद से पाल को तो मजबूती मिली ही वही प्रकृति को संरक्षण जीव जंतुओं का आश्रय स्थल भी बना। वहीं भीषण गर्मी में पेड़ राहत देते हैं, जहां पेड़ ज्यादा होते हैं। वहां दूसरी जगह की अपेक्षा करीब 4 डिग्री तक तापमान कम रहता है। ऐसे पेड़ों को सहेजकर हम गर्मी से राहत पा सकते हैं ।
13 सौ साल पुरानी परंपरा, फर्ज
मेनार कस्बे के दोनों जलाशयों में ब्रह्म सागर की नींव यहां के बाशिंदों की ओर से करीब 13 सौ साल पहले मेवाड़ राज्य के गुहिल राजवंश के संस्थापक बप्पा रावल के समय रखी गई। विशाल नाले को रोककर ब्रह्म सागर तालाब का निर्माण कराया गया। नींव के बाद तालाब की पाल का कार्य निरन्तर चलता रहा। रहडिय़ों पर विशाल पत्थर लाए गए जो आज मजबूती का कारण है। बुजुर्गों के मुताबिक आम के पेड़ बोने का यह सिलसिला नींव रखने के साथ ही शुरू हो गया, जो अब भी जारी है । सैकड़ों वर्षों पहले शुरू हुई इस परंपरा को आज के युवा बखूबी निभा रहे है। यहां स्थानीय परिवारों की ओर से आम की पौध रोपने का अपना ही विशेष धर्म है।
गली मुहाने पर वृक्षों की छाया
अमूमन अनेक गांवों मे प्रवेश के दौरान भीतरी इलाकों में भी पेड़ नजर नही आते हैं, लेकिन मेनार में स्थिति उलट है। गांव में प्रवेश के साथ ही सड़क के दोनों तरफ बड़े वृक्षों की छाया है। गांव के ब्रह्म सागर व धण्ड तालाब पर आम के सैकड़ो वृक्ष हैं। तालाब के लबालब होने के साथ ही यहां तालाबों में पक्षियों की अठखेलियां देखने के लिए पर्यटक खींचे चले आते हैं। शीतल छाया राहगीरों को कुछ पल के लिए यहां रूकने के लिए मजबूर करती है। ये पेड़ तालाब पाल को मजबूती प्रदान करते हैं। मुख्य पानी के दबाव की तरफ पाल पर लगाए पेड़ से पाल की मिट्टी जकड़ी हुई रहती है ।
धण्ड-ब्रह्म सागर की पाल पर 350 आम
धण्ड तालाब की पाल पर 90 बड़े वृक्ष हैं। वहीं ब्रह्म सागर की पाल पर करीब 260 आम्र वृक्ष है। वहीं युवाओं की ओर से विगत 10 वर्षों में बोए पौधों की संख्या 150 है। खुद ही जुगाड़ से जिन्हें कंटीले झाडिय़ों एथोर आदि से गार्ड बना रखे हैं। मई जून में यह फलों के बोझ से लद जाते हैं। ब्रह्म सागर की पाल 20-20 फीट के अंतराल में एक आम का पेड़ है।
धरती को बचाने की छेड़ें मुहिम
पृथ्वी दिवस के तौर पर हर आम आदमी को धरती को बचाने का संकल्प लेना चाहिए। बढ़ते हुए प्रदूषण के बीच वृक्ष एवं पौधरोपण कर इसे नियंत्रित करने के प्रयास कर सकते हैं। बहुमंजिला इमारतों के बीच लोगों के स्वास्थ्य एवं ओजोन परत पर होने वाले संकट को रोका जा सकता है।





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