नई दिल्ली। द्रविड़ राजनीति में अम्मा और कलैगनार के निधन से पिछले कुछ समय से तमिलनाडु में एक जननायक का स्थान खाली है। ऐसा इसलिए कि वहां पर लोकसभा का चुनाव दशकों तक तमिल राजनीति के पर्याय रहे जयललिता और करुणानिधि के बगैर संपन्न हुआ है। यानि द्रविड़ राजनीति में एक जननायक का स्थान खाली है। इस स्थान को हासिल करने के लिए कई द्रविड़ नेता जद्दोजहद में जुटे हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर के राजनेताओं के लिए भी इस स्थान पर काबिज होने का सुनहरा अवसर है। यही वजह है कि 17वीं लोकसभा का चुनाव तमिल राजनीति के लिहाज सेे कई मायनों अहम माना जा रहा है।
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2 दशक पहले गठबंधन का लाभ नहीं उठा पाई थी भाजपा
तमिलनाडु में राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव बढ़ाने के लिए कांग्रेस के बाद पहली बार 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा के लिए रास्ता बनाने की कोशिश की थी, लेकिन जयललिता की 'द्रविड़ पॉलिटिक्स फर्स्ट' की नीति ने उनके इन अरमानों पर पानी फेर दिया था। हालांकि आजादी के बाद कुछ वर्षों तक वहां पर कांग्रेस का प्रभुत्व रहा लेकिन नेहरू के बाद कांग्रेस का असर वहां पर धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया। वाजपेयी को यह अवसर एनडीए सरकार बनाने में एआईएडीएमके की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की वजह से मिला था। इसके बावजूद भाजपा तेलगूभाषी राज्य में अभी तक अपना पांव नहीं फैला पाई है।
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कांग्रेस-डीएमके गठबंधन से है टक्कर
दो दशक बाद एक बार फिर जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके और भाजपा सहित कई अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन बनाकर कर एक साथ चुनाव लड़ा है। इस गठबंधन ने तमिलनाडु लोकसभा का चुनाव में कांग्रेस-डीएमके गठबंधन को चुनौती देने का काम किया है। 18 अप्रैल को प्रदेश के 39 संसदीय क्षेत्रों में से 38 संसदीय सीटों पर मतदान हुआ है। लेकिन अहम सवाल यह है कि भाजपा इस बार भी तमिलनाडु की राजनीति में अहम स्थान बना पाएगी या नहीं। क्या मोदी-शाह भाजपा को विस्तार देने मेंं कामयाब होंगे।
द्रविड़ राजनीति में बेअसर क्यों है भाजपा?
तमिलनाडु में पार्टी का जनाधार बढ़ाने में भाजपा को अभी तक सफलता नहीं मिली है। विगत 3 लोकसभा चुनाव में से केवल 2014 में कन्याकुमारी संसदीय सीट पर भाजपा के प्रत्याशी पी राधाकृष्णन जीत हासिल करने में कामयाब हुए। इसके अलावा भाजपा 2014 में 39 सीटों में से वेल्लोर, कोयंबटूर और पोलाची सीटों पर दूसरे नंबर पर रही। लोकसभा चुनाव 2009 में केवल कन्याकुमारी सीट पर भाजपा प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। इसी तरह लोकसभा चुनाव 2004 में भाजपा उत्तर चेन्नई, नीलगिरीस, कोयम्बटूर और नगेरकोइल संसदीय सीट पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही। यानि 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के एक भी प्रत्याशी लोकसभा चुनाव जीतने में नाकाम रहे।
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2014 में कन्याकुमारी सीट पर मिली सफलता
तमिलनाडु में 2014 में भाजपा एस रामदौस की पीएमके, पट्टाली मक्कल काची और अभिनेता से नेता बने विजयकांत की डीएमडीके, देसीय मुरपोक्कू द्रविड़ार कड़गम के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। इस गठबंधन के तहत भाजपा को छह सीटें मिलीं थी। इनमें से उसने सिर्फ एक सीट कन्याकुमारी जीतने में सफलता मिली। वेल्लोर, कोयंबटूर, पोल्लाची पर दूसरे नंबर पर रही। एक सीट पीएमके को मिली। लेकिन कुछ समय बाद पीएमके ने भाजपा का साथ छोड़ दिया। बता दें कि 2014 में एआईएडीएमके को 37 सीटें पर जीत हासिल करने में सफलता मिली थी और डीएमके के एक भी सांसद लोकसभा में नहीं पहुंच पाए थे।
कौन लेगा अम्मा और कलैगनार का स्थान
वर्तमान में करुणानिधि और जयललिता के निधन से डीएमके की कमान करुणानिधि के पुत्र एमके स्टालिन के हाथ में है तो एआईएडीएमके की कमान उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम और मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी मिलकर संभाल रहे हैं। इसके अलावा राजनीति के मैदान में दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन भी कूद पड़े हैं। दोनों को दक्षिण में एआईएडीएमके के पूर्व प्रमुख जयललिता की तरह करिश्माई नेता माना जा रहा है लेकिन अभी तक अपना असर नहीं छोड़ पाए हैं। दूसरी तरफ पार्टी के पूर्व उपमहासचिव और जयललिता की खास सहयोगी रहीं वीके शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण की पार्टी एएमएमके (अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम) से भी सीधे चुनौती मिलने की संभावना है जिसके प्रत्याशी 38 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं।
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भाजपा के लिए मुफीद समय
भाजपा के लिए राहत की बात ये है कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत ने अपनी पार्टी को लोकसभा चुनाव में न उतारने का ऐलान कर दिया है। अभिनेता कमल हासन राज्य की राजनीति में उतरने के बाद अपना असर नहीं छोड़ पाए हैं। एक साल पुरानी उनकी पार्टी मक्कल नीधि मय्यम (एमएनएम) का असर न के बराबर है। इन्हीं स्थितियों को भाजपा फिलहाल अपने लिए मुफीद मानकर चल रही है। ऐसा इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में करिश्माई चेहरा भाजपा के पास है।
पुरानी नीतियों से हटकर बनाया गठजोड़
यही वजह है कि भाजपा और एआईएडीएमके ने भी अपनी बरसों पुरानी नीति से हटते हुए चुनावपूर्व गठबंधन किया। इस गठबंधन के तहत भाजपा को पांच सीटें मिली हैं। इस गठबंधन में पीएमके भी है वह सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 20 सीटों एआईएडीएमके के खाते में गई है।
भाजपा के सियासी मंसूबे
इस गठबंधन से किसके मंसूबे कितने पूरे होंगे यह तो आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल एआईएडीएमके भाजपा के साथ हैं। ये बात अलग है कि वर्तमान लोकसभा में पूरे पांच साल एआईएडीएमके गठबंधन के बिना भी भाजपा सरकार चलाने में कामयाब रही। दूसरी बात ये है कि तमिलनाडु को लंबे समय से दो पार्टियों के बीच चुनाव नतीजों की अलटी-पलटी करने वाले राज्यों में गिना जाता है।
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