महेश चन्देल. धनला। जाणुन्दा का चारभुजा का मंदिर अद्भुत व प्राचीन है। इन पत्थरों में की गई नक्काशी इसके प्राच्य वैभव की कहानी कहती है। गांव के मध्य राजपुरोहितों के मोहल्ले में स्थित ठाकुरजी के मंदिर से प्रचलित जाणुंदा का यह मंदिर एक बार नजर पड़ते ही देखने वाले को सहज ही आकर्षित कर देता है। वर्षों पुराना यह मंदिर पाषाण कला व स्थापत्य का एक बेजोड़ उदाहरण है। ५०० से अधिक वर्ष पुराने इस मंदिर के चारों और विभिन्न प्रकार की मूर्तियां और अन्य आकृतियां शायद ही कई आस-पास के गांवों में देखने को मिलेगी। मंदिर निर्माण को लेकर ग्रामीणों को कोई ठोस जानकारी नहीं है। लेकिन बुजुर्ग ग्रामीणों की माने तो मंदिर को लेकर कई प्रकार की किंवदंतियां प्रचलित है।
चित्रकारी से भरी पड़ी के संरचना
मंदिर के निर्माण को लेकर ग्रामीणों को कोई जानकारी नही हैं लेकिन मंदिर पर उकेरी गई चित्रकारी ५०० वर्ष से ज्यादा पुरानी है। पूरा मंदिर एक मॉडल के रूप में नजर आता है। पत्थरों को एक दूसरे से जोडक़र तराशा गया है। पानी की निकासी को लेकर मंदिर के आधार में भूतल से चार फीट की ऊंच्चाई पर एक मगरमच्छ के मुंहनुमा आकृति बनाकर पूरे मंदिर की पानी की निकासी सुव्यवस्थित ढंग से की गई है।
खण्डित हैं मूर्तियां और गुबंद
मंदिर के चारों को विभिन्न मुद्राओं में नटराज की मूर्तियां हैं तथा नीचे पशु-पक्षियों व लड़ते हुए हाथियों की आकृति उकेरी हुई है। अधिकतर मूर्तियां खंडित है। जानकारों की माने तो ये खण्डित मूर्तियां मध्य काल में मुगल आक्रांता ने इन मूर्तियों को खंडित किया।





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