-पति की स्टेशनरी की दुकान को फिर संभाला
-परिवार की निभा रही पूरी जिम्मेदारी
-शंकरलाल पन्नू
जैतारण। ‘अबला तेरी यही कहानी, आंचल में है दूध और आखों में पानी...’ कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों के उलट आज की महिला संघर्षों से कठिनाइयों को तो मात दे ही रही हैं, सफलता के झंडे भी गाड़ रही है। इतना ही नहीं, अपनी जिम्मेदारियां भी बखूबी निभा रही हैं। कुछ ऐसे ही संघर्ष की कहानी है जैतारण निवासी सुनीता अग्रवाल की। शादी के मात्र चार वर्ष बाद ही पति का बीमारी से निधन हो गया तो बच्चों के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी सुनीता पर आ गई। लेकिन, उसने हौंसला नहीं खोया और अपने पति की छोटी सी दुकान को ही आय का जरिया बना दिया। आज ये महिला अन्य महिलाओं के प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
2012 में सुनीता अग्रवाल की जैतारण निवासी जगदीशचंद्र अग्रवाल से शादी हुई थी। जगदीश चंद्र के पहले से दो बेटियां थी। शादी के अगले साल ही 2013 में लतिका तथा 2015 में हर्षिता के हाथ पीले कर दिए। इसी साल पति की पीठ में दर्द हुआ। इसके बाद बीमारी बढ़ती गई। चिकित्सकों से इलाज भी करवाया, लेकिन समाधान नहीं हो पाया। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी वह अपने पति को नहीं बचा पाई। आखिरकार 2016 में सुनीता का पति से हमेशा-हमेशा के लिए साथ छूट गया। जीविकोपार्जन के लिए मात्र पति की स्टेशनरी की दुकान ही थी। लेकिन, सुनीता ने हौसला नहीं खोया और फिर से साहट जुटाते हुए पति की दुकान संभालनी शुरू कर दी।
आत्मविश्वास नहीं खोया
सुनीता ने पति का निधन होने के बाद फिर से साहस जुटाया। कुछ व्यापारियों का सहयोग मिला, तो कुछ लोगों की सम्पत्ति पर भी नजर थी। लेकिन, वह अपने लक्ष्य पर अडिग रही। उसने अपने आप को संभाला और हिम्मत जुटाकर फिर से दुकान खोलनी शुरू कर दी। शुरू-शुरू में परेशानी हुई, लेकिन वह संघर्ष करती रही। प्रात: नियमित अपने दैनिक कार्य पूरे कर दुकान पर पहुंच जाती और दिनभर स्टेशनरी की दुकान पर बैठकर व्यापार संभालती। सुनीता का आज भी ये ही नित्यकर्म है। उसका कहना है कि जीवन में कैसी भी विपत्ति आ जाए, हौंसला नहीं हारना चाहिए।





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