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पोलि-ट्रिक्स : चुनाव से पहले यहां रूठने-मनाने का रिवाज है, पढ़ें पूरी खबर...

-राजेन्द्रसिंह देणोक
पाली। हाथ वाली पार्टी के पुराने क्रांतिकारी नेताजी की आखिर घर वापसी हो ही गई। सूबे के मुखिया के सामने उन्हें मंच पर बुलाकर इस रिवाज को निभाया गया। उनका लौटना भी विवादों और चर्चाओं का तानाबाना बुन गया। वे आए तो उनके ‘परम हितैषी’ रूठ गए। एक को मनाए तो दूसरा खफा। रूठने-मनाने का यह रिवाज काफी पुराना है। ये तो चुनाव सर पर है इसलिए सबको चिंता है। वरना किसे पड़ी है। इसीलिए तो सियासी ऋण में उतरे मूछों वाले नेताजी टेंशन में है। उनके सामने दोहरा संकट ये कि किसे मनाए और किसे नहीं। अब मूछों वाले नेताजी कैसे अपनी करामात दिखाएंगे, ये तो वही जानें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो परिणाम सबके सामने हैं।

पुराने वादे की सुरसुरी
फूल वाली पार्टी की दबंग नेत्री का जलवा अब भी बरकरार है। वे पार्टी के कार्यक्रम में पाली शहर आईं तो उनकी आवभगत में कहीं कोई कमी नहीं दिखी। नेत्री ने बातों ही बातों में सूबे की सरकार को खूब लपेटा। लेकिन एक सुरसुरी भी छोड़ गई। जोधपुर के एक नेताजी को कोई वादा याद दिलाया। नेताजी भी हां में हां मिला गए। ये वादा क्या था, इस पर सुरसुरी शुरू हो गई। सबने अपना-अपना माथा लगाया। कइयों को तो ये भी कहते सुना कि केंद्र तक पहुंच रखने वाले जोधपुर के नेताजी की ये भोलावण थी। सब जानते हैं कि नेत्री और उनका छत्तीस का आंकड़ा है।

सुर्खियों में अफसरगिरी-नेतागिरी
मेहंदी नगरी में इस दिनों एक अफसर की अफसरगिरी और नेतागिरी साथ-साथ सुर्खियों में है। ये अफसर सूबे की सरकार में खासे ऊंचे ओहदे पर है। ये सुर्खियों में अपने ओहदे की वजह से नहीं, अपितु सियासत में लगाव के कारण है। टिकट के जुगाड़ में तो इनका दांव इस बार नहीं लग पाया। लेकिन सत्ता का सियासी फायदा पूरा उठा रहे हैं। यहां इनका दखल इतना बढ़ा हुआ है कि स्थानीय शासन-प्रशासन ही नहीं, जीते हुए जनप्रतिनिधि भी मन मसोस रहे हैं। अब सत्ता और अफसरी के रौब तो दिखाएंगे ही, आखिर सीट पर भी तो नजर है।



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