जिगर के टूकड़ों की अभिशॉप जिंदगी का बोझ बूढ़े होते कंधों पर....
-मानसिक विमंदित अपंग पुत्र व पुत्री को ढ़ोते एक मजदूर पिता की व्यथा
-जितेंद्र जैकी-
झालावाड़. कभी कभी एक छोटे से खुशहाल परिवार की जिंदगी भी कैसे अभिशॉप ग्रस्त हो जाती है इसका अहसास जिले की झालरापाटन तहसील की ग्राम पंचायत दुर्गपुरा के गांव कोटड़ा में देखने को मिला। एक अधेड़ पिता अकेला अपने मानसिक विमंदित व नाटे अपंग इकलौते पुत्र व पुत्री को सम्भाल रहा है। उसकी जीवन संगिनी इन संतानों को हंसता खेलता अपने पति की गोद में डाल कर हमेशा के लिए स्वर्ग सिधार गई थी। करीब तीस साल से ग्रामीण इस मजदूर की जिंदगी भी अपनी औलादों को सम्भालने मेंं ही बीत रही है।
गांव कोटड़ा निवासी मेम्बर बंजारा की शादी करीब तीस साल पहले सीता बाई से हुई थी। शादी के बाद उसके एक पुत्री गुड्डी हुई व उसके बाद एक पुत्र हुआ। बचपन में नटखट होने पर बच्चें की नानी ने उसका नाम वकील रख दिया। गुड्डी जब पांच साल की हुई तो उसकी लम्बाई बढऩा रुक गई इसी दौरान वकील की भी मानसिक वृद्वि व शारीरिक विकास रुक गया। इसी दौरान सीता बाई भी बीमार होने से चल बसी। मानसिक विमंदित दोनो बच्चों को उनकी मां के बगैर सम्भालना मुश्किल था लेकिन मेम्बर ने नियति का फैसला मंजूर कर लिया व मजदूरी के साथ बच्चों को भी पालना शुरु किया।
-कंधे पर लाद कर ले जाता है पिता
मेम्बर की पुत्री गुड्डी बाई की उम्र 29 साल है लेकिन उसकी लम्बाई मात्र तीन फिट के करीब है वहीं पुत्र वकील की लम्बाई मात्र दो फिट के करीब है। दोनो घर के आंगन में बेठे रहते है। शारीरिक विकार के कारण कुछ कर नही पाते। पिता ही दोनो को सम्भालता है। उन्हे नहलाना, कपड़े पहनाना, खाना खिलाना व कंधें पर लाद कर इधर से उधर ले जाने का काम पिता मेम्बर ही करता है।
-पेंशन लेने जाने में होती है परेशानी
दोनो बच्चों को हालाकि निशक्तजन की 750 रुपए प्रतिमाह पेंशन मिलती है इसके लिए दोनो बच्चों को झालावाड़ में बैंक में ले जाना पड़ता है। इसमें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। गांव कोटड़ा में कोई बस आदि नही जाती इसलिए झालावाड़ से ऑटोरिक्शा वाले को बुलाना पड़ता है वह आने जाने के कम से कम 200 रुपए लेता है। इससे मेम्बर को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
-भविष्य की रहती है चिंता
मेम्बर ने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद दूबारा विवाह भी नही किया जबकि परिजनों ने बच्चों की परवरिश के लिए दूसरा विवाह की मंजूरी भी दे दी थी लेकिन उसने सोचा कि सौतेली मां बच्चों से जाने कैसा बर्ताव करेगी। अब उसे बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है क्योकि उसका मानना है कि मेरे बाद बच्चों का क्या होगा, इन्हे कौन सम्भालेगा, यह सोचकर उसकी आंखे भर आती है।
-दया सुधारने का प्रयास किया जाएगा
-इस सम्बंध में झालावाड़ के सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक गौरी शंकर मीणा का कहना है कि जिले के गांव कोटड़ा में अपंगों को विशेष योग्यजन पेंशन योजना के तहत लाभ दिया जा रहा है। बालिग होने से उन्हे रोजगार से जोडऩे के लिए ऋण उपलब्ध कराने का प्रयास व विवाह के लिए भी प्रयास किया जाएगा ताकि विवाह के बाद मिलने वाले अनुदान से भी वह अपनी दशा सुधार सकेगें। ऋण सिर्फ उनके नाम से ही हो सकता है। उसका पिता रोजगार संचालन में उनकी सहायता कर सकता है। गंाव कोटड़ा में जाकर उनकी स्थिति का पता लगाकर सहानुभूति विचार कर यथा सम्भव नियमानुसार सहायता प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।
-निशक्तजनों के जीवनयापन का कर्तव्य सरकार का
इस सम्बंध में झालावाड़ के अभिभाषक परिषद के पूर्व अध्यक्ष व वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र सिंह झाला का कहना है कि समाज में निशक्तजनों के लिए जीवन व जीवनयापन का कानून बना हुआ है। इसके तहत विकलांगों के अधिकार अधिनियम 2011 में स्पष्ट उल्लेख है कि विकलांगों को जीवन व जीवन यापन का अधिकार है। अधिनियम के अनुसार सरकार की ओर से इन्हे प्रतिमाह दो हजार रुपए पेंशन के तौर पर देने का भी प्रावधान है। अधिनियम में यह भी काननू है कि घर में पड़े रहने वाले विकलंाग व्यक्तियों, संस्थानों में विकलंाग ग्रसितो तथा अत्यधिक सहायता की आवश्यकता सबहत व्यक्तियों के साथ भी विशेष कार्यक्रम हस्तक्षेप अनिवार्य रुप से लागू हो। सरकार व प्रशासन को ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति पूर्वक विचार कर योजना बनानी चाहिए।





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