विनोद शर्मा
करौली. आस्थाधाम कैलादेवी में धर्म के नाम पर बनाई गई धर्मशालाओं का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। इस दौरान यहां आने वाले यात्रियों से आवास सहित अन्य नाम पर जमकर कमाई की जा रही है। ऐसा हर बार के मेले में होता है लेकिन न प्रशासन बोलता है न पंचायत कुछ कार्रवाई करती है।
आस्थाधाम कैलादेवी में लगभग ७०० धर्मशालाएं है। इनका नाम तो धर्मशाला है लेकिन ये खुले तौर पर कमाईके केन्द्र हैं। कुछ धर्मशालाएं तो होटल, लॉज की तर्ज पर कमाई कर रही है जबकि कुछ में सुविधाओं के नाम पर मनमानी राशि यहां आने वाले भक्तों से वसूली जा रही है। पंचायत व राजस्व विभाग की जमीन पर इन धर्मशालाओं का निर्माण आगरा, दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता सहित अन्य प्रमुख शहरों के धनाढ्य लोगों ने यात्रियों की सुविधा के नाम पर कराया हुआ है। कैलादेवी में आने वाले यात्रियों को नि:शुल्क रूप से आवास सुविधा उपलब्ध कराने के लिए इन धर्मशालाओं के लिए रियायती दर पर भूमि उपलब्ध कराई गई। लेकिन ये धर्मशाला अब व्यवसायिक रूप में है। सुविधा और व्यवस्था के नाम पर इन धर्मशालाओं में श्रद्धालुओं से मनमानी राशि वसूली जा रही है। कुछ धर्मशाला ऐसी भी है जिसमें आम यात्रियों को प्रवेश ही नहीं दिया जाता। वहां केवल धर्मशाला बनाने वाले सेठ के परिजन, रिश्तेदार या उनके मित्र ही ठहराव कर सकते हैं। अनेक धर्मशालाओं में दुकानें बन गई हैं जिनसे हजारों रुपएका किराया वसूला जा रहा है।
सेठों ने सुध नहीं ली, प्रबंधकों ने बनाया व्यवसायिक
अधिकांश धर्मशालओं में निर्माण के बाद सेठों ने उनके संचालन के लिएस्थानीय लोगों को प्रबंधक बना कर रख दिया। इन प्रबंधकों द्वारा ही धर्मशालाओं का व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है। अनेक धर्मशाला निर्माता सेठों को इसका शायद अंदाजा भी न होगा कि उन्होंने जिस धर्म की भावना से धर्मशाला बनवाई उसका उपयोग धर्म के लिए नहीं बल्कि कमाई में किया जा रहा है। कुछ सेठों के दिवगंत होने पर प्रबंधक ही काबिज हो गएहैं। कुछ ऐसी भी धर्मशाला हैं जहां के प्रबंधक सेठों या उनके परिजनों के आने पर बेहतरीन व्यवस्था उनको उपलब्ध कराकर उनको खुश करते हैं। बाकी अपना धंधा चलाते हैं। अनेक प्रबंधकों ने धर्मशालाओं को अपना आवास बना लिया है, जिससे धर्माथ उद्देश्य भी नहीं रहा है। करणपुर मार्ग, रेंज, आगरा पड़ाव, दुर्गासागर, हनुमान जी के समीप आदि स्थानों पर संचालित धर्मशालाओं में श्रद्धालुओं से एक-एक कमरे के नाम पर ५०० से ६०० रुपए वसूले जा रहे हैं। बड़ी बात ये भी है कि अनेक धर्मशालाओं के मुख्य दरवाजे तथा परिसर में भोग प्रसाद, खेल, खिलौने व अन्य सामान की दुकान खुल गई हैं। इन दुकानों के निर्माण या संचालन पर न प्रशासन ने आपत्ति की न पंचायत ने कभी रोका टोका।
नहीं होती कभी जांच
प्रशासन या पुलिस ने कभी धर्मशालओं की जांच तक नहीं की कि इनमें क्या आपराधिक और अनैतिक कृत्य होते हैं। आरोप है कि कुछ धर्मशाला तो समाजकंटकों की शरणस्थली भी बने हैं। एक वर्ष पहले एक धर्मशाला में एक महिला श्रद्धालु की हाथ-पैर काट हत्या कर दी गई थी। अन्य अपराधिक गतिविधियों को लेकर भी कुछ धर्मशालाएं संदेह के घेरे में रही हैं। बावजूद इसके धर्मशालाओं की जांच में कोताही बरती जाती है।
अब जांच कर कार्रवाई करेंगे
सही बात है कि अनेक धर्मशाला व्यवसायिक बन गई है,जो श्रद्धालुओं ने मनमाना शुल्क वसूल करती है। उच्च अधिकारियों से बात कर धर्मशालाओं की जांच कराएंगे। इसके बाद कार्रवाई होगी।
फूलवती मीना सरपंच कैलादेवी
केएल, सीसी। कैलादेवी की एक धर्मशाला में चूड़ी बेचता दुकानदार।





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