धोरीमन्ना. निकटवर्ती सूदाबेरी गांव का एक गरीब परिवार इन दिनों जिंदगी से ऐसी जंग लड़ रहा है कि सुनकर ही आंखें भर आएं। बीमारी, लाचारी और आर्थिक विपन्नता ने इस परिवार को घेर लिया है।
बूढ़े मां-बाप की दिव्यांग आंखों में अब दर्द ही दर्द छलक रहा है। मासूम बच्चों की हंसी मां-बाप के संघर्ष ने छीन ली है। परिवार का आधार घर की बहू कैंसर की बीमारी से जूझ रही है और घर का मुखिया इन पांच जिंदगियों की जिम्मेदारी में आधा हुए जा रहा है।
सूदाबेरी गांव के नगजीराम के परिवार में दो बच्चे, मां-बाप और पत्नी है। दो साल पहले तक वह अपनी जिंदगी में खुश था। बूढ़े मां-बाप की आंखों की रोशनी चली गई थी लेकिन उसकी पत्नी धापूदेवी इनकी सेवा में जुटी थी और वह अपनी मेहनत मजदूरी से परिवार का पालन-पोषण कर रहा था।
दिव्यांग मां-बाप भी बेटे की बातों में खुशी पढ़ लेते लेकिन अचानक दो साल पहले उसकी पत्नी बीमार हुई और कैंसर घोषित किया गया। इसके बाद धोरीमन्ना से सांचौर, अहमदाबाद, डीसा, धानेरा, उदयपुर में दो साल से चक्कर काटता रहा। पांव में कैंसर इस कदर हुआ है कि धापू चारपाई में है और रात दिन कराह रही है।
बीमारी में सब खर्च
दो साल से मजदूर नगजीराम ने बीमारी में खेत, गहने और जो कुछ उसके पास था सब खर्च कर दिया। बीमारी के उपचार में उसके लिए परिवार पालना भी मुश्किल हो गया है। पाले भी तो कैसे वो बीमारी के चलते कुछ काम नहीं कर पाता और घर में मासूम बच्चे और दिव्यांग मां-बाप भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
मदद को सरकार की आस
आर्थिक मजबूरियों और बीमारी से घिरे एेसे परिवारों को सरकार की एेसी मदद की दरकार है जिसमें न केवल बीमारी का उपचार हो इन परिवारों को पालन-पोषण की भी सहायता मिले लेकिन अभी तक इसके लिए मदद नहीं मिली है। बीमारी के अलावा परिवहन और अन्य खर्चों ने इस परिवार को तोड़ दिया है।
जब तक है सांस, रहेगी आस
यह परिवार जब तक है सांस रहेगी आस ...की बात कहता है। धापू के उपचार को दो साल से भटक रहे इस परिवार का कहना है कि अब उनके लिए उपचार की उम्मीदें कम हुई हैं लेकिन सांस चल रही है तब तक उम्मीद करते हैं कि कहीं से कोई मदद मिलेगी।





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