गंगापुरसिटी . उच्च तकनीक भले ही गंगापुर की पहचान को ‘लील’ गई हो, लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता ने भी इसे कम ‘टीस’ नहीं दी है। गंगापुरसिटी स्टेशन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाला ‘लोको’ अब स्मृतियों में ही बाकी है। लोको के काम आने वाली सैकड़ों बीघा भूमि अब अनुपयोगी पड़ी है। जनप्रतिनिधियों की खामोशी टूटे तो इस जमीन पर बड़े कारखाने के रूप में लोगों को रोजगार की सौगात मिल सकती है।
उदासीनता का आलम यह है कि पिछले कई सालों से अनुपयोगी पड़ी इस जमीन को रोजगार की नजर से परखने में जनप्रतिनिधि रुचि नहीं दिखाई है। इसको लेकर लोगों के मन में भी उबाल है। टैक्नोलॉजी में बदलाव के कारण गंगापुरसिटी का स्टीम लोकोशेड तुगलकाबाद में स्थानांरित किया गया था। इसके बाद लोकोशेड, कैरिज, यार्ड एवं गंगापुरसिटी-छोटी उदेई के बीच अनुमानित करीब डेढ़ सौ बीघा से अधिक भूमि खाली पड़ी है।
लौट गए सुनहरे प्रोजेक्ट
लोको की विदाई के बाद इस खाली पड़ी जमीन को उपयोग में लेने और लोगों को रोजगार देने के लिहाज से यहां कई स्वप्निल प्रोजेक्ट आए, लेकिन यह सब अनदेखी की भेंट चढ़ गए। जानकार बताते हैं कि पूर्व में रेलवे सुरक्षा बलों के लिए ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना के लिए यह भूमि देखी गई, लेकिन बेहतर प्रयास नहीं होने से यह कोटा में चला गया। इसके अलावा मल्टी डिसीपिलेनरी ट्रेनिंग सेंटर खोलने के लिए भी कवायद हुई, लेकिन कथित रूप से रेलवे अधिकारियों ने जगह को अपर्याप्त बताते हुए इसे खोलने में असमर्थता जता दी।
वहीं इंटरनल कंटेनर डिपो के लिए भी रेलवे ने हिण्डौनसिटी को चुना, जबकि गंगापुरसिटी में भी इसके लिए पर्याप्त जगह थी। लोगों का कहना है कि रेलवे अधिकारियों की रुचि और जनप्रतिनिधियों के प्रयास होते तो अब खाली भूमि में पसरी वीरानी में ‘बहार’ आ सकती थी। साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार के द्वार भी खुलते।
तो बन सकती है बात
रेलवे की बेकार पड़ी भूमि-भवनों का उपयोग गंगापुर में विद्युत लोकोशेड का कारखाना पुन: स्थापित करने, डीएमयू रैक, कोच कारखाना एवं ट्रेनिंग सेंटर जैसी विकास की परियोजना में हो सकता है। कुछ समय पहले इसकी मांग एक जनप्रतिनिधि की ओर से उठाई गई, लेकिन वह ठंडे बस्ते में चली गई।
कभी गंगापुर की पहचान थी लोको
देश के विभिन्न हिस्सों से भाप के इंजन गंगापुरसिटी स्टेशन पहुंचते थे। गंगापुर के लोको में इनके बदलने का काम होता था। देशभर की गाडिय़ां यहीं से बनकर गंतव्य को जाती थीं, लेकिन अब यह सिर्फ इतिहास की बातें हैं। जानकार बताते हैं कि वर्ष 1920 से 1925 के बीच करीब सौ साल पहले यहां लोको को बढ़ावा मिला। गंगापुर का चयन भी इसी जमाने में लोको निर्माण के लिए हुआ।
दे चुके हैं ज्ञापन
कुछ दिनों पहले अध्यक्ष ब्राह्मण समाज, अध्यक्ष राजस्थान पेंशनर्स समाज, अध्यक्ष व्यापार महासंघ, अध्यक्ष रेलवे पेंशनर्स एसोसिएशन तथा अध्यक्ष प्राइवेट चिकित्सा समिति आदि संगठनों ने रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को एडीएम के माध्यम से ज्ञापन भेजा था। इसमें रेलवे की खाली अनुपयोगी जमीन को काम में लेने की मांग की थी। साथ ही कारखानों संबंधी सुझाव भी ज्ञापन में दिए गए थे, लेकिन किसी ने इसकी सुध नहीं ली है।
यह है भूमि
लोको शेड की भूमि - 30 बीघा
ताजपुर रेलवे लाइन की जमीन - 60 बीघा
अप-एंड डाउन यार्ड तक की भूमि - 40 बीघा
इनके लिए नहीं हुई पहल
- रेलवे सुरक्षा बल के लिए ट्रेनिंग सेंटर
- मल्टी डिसीपिलेनरी ट्रेनिंग सेंटर
- इंटरनल कंटेनर डिपो
- विद्युत लोकोशेड कारखाना पुन: स्थापित करने
- डीएमयू रैक
- कोच कारखाना एवं ट्रेनिंग सेंटर
- सैनिक छावनी
- आयुध डिपो
- रेल कोच कारखाना
यह बोले लोग
जनप्रतिनिधियों और रेलवे प्रशासन को इस ओर ध्यान देकर गंगापुरसिटी को किसी कारखाने की सौगात देनी चाहिए, जिससे यहां के लोगों को रोजगार के अवसर पैदा हो सकें। साथ ही शहर अपनी पहचान बना सके।
- अरविंद आरड्या, शहरवासी
रेलवे की कई बीघा भूमि में कोई अच्छी इंडस्ट्री आ सकती है। इससे शहर को एक नई पहचान मिलेगी। स्थानीय युवाओं को यहीं रोजगार मिलने से उनका पलायन रुक सकेगा। साथ ही इस जमीन का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
- सुमन देवी, शहरवासी
कई मर्तबा लोगों की ओर से यह मांग उठाई गई है। अब चुनाव के समय जनप्रतिनिधियों को जनता को आश्वस्त करना चाहिए कि वह इस जमीन को उपयोग में लाकर लोगों को रोजगार की व्यवस्था करेंगे।
- बबीता, शहरवासी
उदासीनता के चलते कई बड़े प्रोजेक्ट यहां से लौट गए। यह शहर के हित में नहीं है। इस जमीन का उपयोग होने से शहर के विकास के नए रास्ते खुलेंगे। जनप्रतिनिधि एवं रेलवे को इसकी पहल जल्द करनी चाहिए।
- प्रमोद शर्मा, शहरवासी










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