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Mahavir Jayanti- सिद्धार्थ घर जन्म्यो त्रिशलानंदन भयो, दुनिया को दिया जियो और जीने दो का संदेश

अजमेर। सूूफीयत की खुशबू फैलाने वाले गरीब नवाज और वेदों की ओर लौटने का संदेश देने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती के अजमेर शहर में बरसों से अंदिगम्बर और श्वेताम्बर समाज के मंदिर और जिनालय धार्मिक आस्था के केन्द्र हैं।

 

यहां भगवान महाहिसा परमो धर्म का सिद्धांत गुंजायमान हो रहा है। वीर सहित 23 तीर्थंकरों की सीख सर्वपंथ समभाव का एहसास करा रही है।भगवान महावीर स्वामी ने जीयो और जीने दो का संदेश देकर देश व दुनिया को शांति और अहिंसा का मार्ग दिखाया है। जैन धर्म ने चौरासी हजार साल का सफर किया है। जैन धर्म सनातन धर्म है जो सतयुग से चला आ रहा है। वर्तमान में भगवान महावीर का शासन चल रहा है।

 

विकास में अग्रणीय जैन समुदाय

अजमेर में जैन धर्मावलम्बियों ने भी शहर के सामाजिक,धार्मिक,औद्योगिक और शैक्षणिक विकास में अहम योगदान दिया है। अजमेर का जैन समाज पुराने शहर से बाहर निकल कर विभिन् न कॉलोनियों में बस रहा है। ऐसे स्थान पर भी अब मंदिर व स्थानक बन गए हैं। अजमेर के दिगम्बर व श्वेताम्बर जैन समाज ने साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक सरोकार,जीव दया के परोपकारी सहित कई कार्य कर अलग से पहचान बनाई है। यहां के जैन समाज बिना अजमेर की परिकल्पना करना बेकार है। ऐसा कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

 

श्वेताम्बर समाज के प्रमुख धार्मिक स्थल

जैन श्वेताम्बर संघ की अजमेर में मुख्यतया तीन श्रेणियां हैं। इनमें मूर्ति पीजक धर्मसंघ,तेरापंथी और स्थानकवासी धर्मसंघ प्रमुख हैं। इनमें सुंदर विलास मंदिर, श्री वद्र्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ बी.के.कौल नगर/लाखन कोटड़ी, वैशाली नगर स्थानक,स्वाध्याय भवन पुष्कर रोड सहित अन्य धामिर्क स्थल समाज की आस्था के केन्द्र हैं। पुष्कर रोड स्थित श्री संघ श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ का स्वाध्याय भवन आध्यात्मिक प्रचार का अहम केन्द्र है।

 

दादाबाड़ी : पालबीचला स्थित दादाबाड़ी दादा गुरु जिनदत्तसूरी की निर्वाण स्थली है। उनका निर्वाण विक्रम संवत 1211 में हुआ था। समय-समय पर इस स्थान का विकास होता रहा। प्राचीन चरण खंडित होने पर यहां नूतन चरण स्थापित किए गए। यहां हर साल मेला लगता है।


उत्तर भारत की सबसे बड़ी प्रतिमा दर्शनीय

श्रीनगर रोड स्थित शासन तीर्थ क्षेत्र का निर्माण प्रगति पर है। यहां पर अनुपम कृति सवा 11 फीट ऊंची 24 तीर्थंंकरों की प्रतिमाओं का निर्माण हो गया। उत्तर भारत की सबसे ऊंची खडगासन जैन प्रतिमा जो 51 फीट की है। वह प्रतिष्ठित कर दी गई है। जिन शासन तीर्थ क्षेत्र का शिलान्यास आचार्य वसुनंदी महाराज ने 29 सितम्बर 2014 को किया था। यहां पर पैथालॉजी लैब व समारोह स्थल बनना भी प्रस्तावित है। इस निर्माण में करीब 50 करोड़ रुपए की लागत आएगी।

 

नाम अनेक पहचान एक
जैन धर्म के उदय के बाद इसके अनुयायी बढ़े तो प्रसार भी होता गया। प्रथम तीर्थंकर भघवान आदिनाथ सतयुग के समय के हैं। उसके बाद कालचक्र के थपेड़ों से संघर्ष करते हुए यह धर्म धीरे-धीरे वटवृक्ष के रूप में फैलता गया। इसकी जड़ें मजबूत हुई तो इसका फैलाव भी हो रहा है। बाद में जैन समाज दो भागों में बंट गया। वैसे दोनों समाज चौबीस तीर्थंकरों को मानते हैं। पूजा पद्धति व साधुओं का पहनावा,आहार क्रिया व अन्य दिनचर्या अलग-अलग है।

 

बड़ी संख्या में हैं जैन परिवार
आज जैन धर्म के अनुयायी दिगम्बर और श्वेताम्बर समाज के रूप में जाने जाते हैं। दिगम्बर समाज में खण्डेलवाल,जैसवाल, पल् लीवाल,अग्रवाल जैन व पोरवाल गौत्र के परिवार हैं। इसी प्रकार श् वेताम्बर समाज में स्थानकवासी,मंदिरमार्गी व तेरहपंथी परिवार हैं। भले ही इनके नाम अलग-अलग हैं,लेकिन इनकी पहचान जैन है। अजमेर में दिगम्बर व श्वेताम्बर समाज के परिवार बड़ी संख्या में हैं।



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