प्रमोद भटनागर
नाथद्वारा. धरती पर जो चीजें हैं वे कहीं अन्यत्र नहीं है। यहां पर नश्वर होते हुए भी हम शास्वत को पा सकते हैं। विनाशी होकर अविनाशी को पा सकते हैं। जन्मा होकर भी अजन्मा को पा सकते हैं। इसलिए पृथ्वी से श्रेष्ठ कोई अन्य जगह नहीं है।
यह विचार यहां दामोदर धाम में चल रही कथा में पं. श्रीकांत शर्मा ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि नास्तिक और आस्तिक के जीवन में बड़ा अंतर होता है नास्तिक के जीवन में कोई विपरीत घटना होती है तो वह ईश्वर को दोष देने लगता है अपनी तकदीर को दोष देने लगता है, लेकिन आस्तिक के जीवन में कोई विपरीत घटना होती है तो वह उसे भी ईश्वर की कृपा मानकर ग्रहण करता है। आस्तिक भगवान से यही कहता है कि, तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे कांटों से भी प्यार, हमको दोनों ही पसंद तेरी धूप और छांव। लोग जीवन के एक पक्ष को देखने लगते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेम से बड़ा कुछ भी नहीं है। प्रेम से जीवन सुखी होता है। सब कुछ भगवान की मर्जी से चलता है। मनुष्य को नियति के साथ समझौता करना सीखना चाहिए। कथा के दौरान उन्होंने रासलीला के भावों का भी बखान किया। वहीं, कथा में बिहार के मगध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं नैक परिषद दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. वीरेन्द्रनाथ पाण्डेय, प्रो. शिवसिंह जेआरएन राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. शिवसिंह, विश्व हिन्दी परिषद के उपाध्यक्ष डॉ. भगवान शर्मा का व्यासपीठ से सम्मान किया गया।





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