अलवर. अक्षय तृतीया के अबूझ सावे पर सात मई को बाल विवाह रोकने के लिए जिला प्रशासन ने फिर कमर कस ली है। इसके लिए महिला समूह, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आंगनबाडी कार्यकर्ता, साथिन व आशा सहयोगिनी के कोर ग्रुप बनाने के साथ ही पंडित, बैंडवादक, हलवाई व मैरिज होम संचालक आदि को 18 मई की पीपल पूर्णिमा तक पाबंद कर दिया गया है। पीपल पूर्णिमा पर भी बड़े पैमाने पर बाल विवाह होते हैं।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार पिछले दो सालों में जिले में करीब 50 बाल विवाह रुकवाए गए। गत मार्च में दो बाल विवाह रुकवाए गए थे। जिले में 7 मई को अक्षय तृतीया पर फिर से बाल विवाह होने की आशंका है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने अलवर समेत 12 जिलों को बाल विवाह के लिहाज से संवेदनशील घोषित किया हुआ है।
अक्षय तृतीया व पीपल पूर्णिमा पर होते हैं बाल विवाह
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर बाल विवाह अक्षय तृतीया व पीपल पूर्णिमा के अबूझ सावे पर होते हैं। इस दिन ग्रामीण इलाकों में एक ही परिवार के कई बालक-बालिकाओं का विवाह कर दिया जाता है। अलवर जिले के मेवात क्षेत्र में अशिक्षा व गरीबी और विवाहों में होने वाला खर्च बचाने के लिए एक-एक परिवार में कई-कई बालक बालिकाओं का एक साथ बाल विवाह कर दिया जाता है।
विभाग ने बनाया कंट्रोल रूम
बाल आधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक ऋषिराज सिंगल ने बताया कि अक्षय तृतीया व पीपल पूर्णिमा पर बाल विवाह रोकने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग ने जिला मुख्यालय पर कंट्रोल रूम बनाया है। समाज की मानसिकता व सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास भी किया जा रहा है।
फैक्ट फाइल
वर्ष 2017 -18 में 38 प्रकरण
वर्ष 2018 -19 में 12 प्रकरण
वर्ष 2018 -19 में 3 प्रकरण सामने आ चुके हैं।





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