सुरेन्द्र चतुर्वेदी
करौली. जिले में धौलादाता हो या आमरेकी या फिर मानाखुर। जिले के ये गांव तो बानगी हैं। इन जैसे 170 गांव तथा 117 ढाणियां और शहर-कस्बों के अनेकों गली - मोहल्ले भी हैं जहां के लोगों के कंठ बिना पानी के सूख रहे हैं।
जिलेवासियों के लिए बिडम्वना ही है कि आजादी के सात दशक बाद भी जिले के लाखों लोगों को दैनिक जीवन की जरूरत के मुताबिक समुचित पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है। इस मुसीबत के मारे डांग इलाके के आमरे की, राहिर-बनीजरा, अलबत की, कूरत की, नेनिया की , मनाखुर आदि गांवों से ही नहीं बल्कि इन जैसे और भी दर्जनों गांव हैं जहां से लोग पानी की खातिर पलायन को मजबूर हैं।
खास बात यह है कि डांग इलाके के गांवों से पलायन की नौबत हर वर्ष गर्मी के सीजन में आती है। बावजूद इसके इन गांवों में पानी के स्थायी प्रबंध नहीं किए जाते। ऐसा नही करने के कारण कुछ भी हो लेकिन यह स्थिति राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की समस्या के प्रति बेपरवाही को जाहिर करती है।
गांवों की बात तो पीछे की है। जिला मुख्यालय और हिण्डौन जैसे शहर तक में लोग पानी से व्याकुल हैं। जो समर्थ हैं वे तो पानी खरीद कर या नलकूप की खुदाई कराकर प्यास बुझा रहे हैं लेकिन सामान्य या निर्धन वर्ग के लोग रोजाना पानी का प्रबंध करने में पसीना बहाते हैं। करौली, हिण्डौन, नादौती समेत अन्य कस्बों-गांवों में पानी के मारे व्यथित लोगों का रोज गुस्सा देखने को मिल रहा है।
हिण्डौन में 58 करोड़ की पेयजल योजना पांच वर्ष से स्वीकृत है लेकिन फिर भी हिण्डौन की जनता प्यासी है क्योंकि योजना का काम अधूरा है। चम्बल का पानी रेंगते-रेंगते नादौती इलाके में तो पहुंच गया। लेकिन समस्या ग्रस्त इलाकों में लाइन नहीं डलने से लोगों की प्यास नहीं बुझ पाई है।
इसी तरह करणपुर, मण्डरायल, कैलादेवी, मासलपुर, हिण्डौन सिटी क्षेत्र के गांवों में पेयजल संकट गहरा गया है। जलस्तर नीचे जाने से हैण्डपम्प नकारा हो गए हैं। हैण्डपम्प पानी की जगह हवा फेंक रहे हैं।
स्थिति यह है कि जिले में जिन इलाकों में पानी का संकट सामने आता है तो हर वर्ष टैंकरों से पानी पहुंचाकर प्यासे लोगों को शांत कर दिया जाता है। इस बार भी जिले में टैंकरों से पानी सप्लाई के लिए 15 दिन पहले लगभग सवा करोड़ स्वीकृत किए जा चुके हैं।
यह बीत दीगर है कि 42 और 43 डिग्री के तापमान में जब पानी की चहुं ओर त्राहि-त्राहि मच रही है तब इन टैंकरों से पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हुई है। 15 दिन पहले बजट स्वीकृत होने पर भी पानी के संकट से त्रस्त लोगों के यहां टैंकरों का नहीं पहुंचना समस्या के प्रति प्रशासन की संवेदनहीनता को बयां करता है।
हैरत तो यह है कि जिले में पांचना बांध है और चम्बल नदी बहती है। बनास भी सपोटरा इलाके में होकर गुजर रही है। फिर भी जिले के लोग प्यास के मारे बिलख रहे हैं। इसके लिए कोई एक दल या जनप्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं है। अलग- अलग दलों का शासन रहा है और जनप्रतिनिधि भी विभिन्न रहे हैं लेकिन किसी ने भी पानी जैसी जरूरी जरूरत को पूरा करने में गम्भीरता नहीं दिखाई।
इतना ही नहीं अनेक विधायक तो प्रदेश और कुछ सांसद केन्द्र सरकार में मंत्री भी रहे हैं। बावजूद इसके वे समस्या से किनारा किए रहे। इन सभी के लिए जिले में पानी की मारामारी के हालात शर्मसार कर देने को काफी हैं।
अचरज की बात यह भी है कि विधानसभा चुनाव में इस समस्या पर कोई न बोला। जीतने के बाद भी जिले के किसी विधायक ने इस समस्या के समाधान की पहल नही की। वैसे राज्य और केंद्र की योजनाओं से गांवों में नलकूप खुदवाने, एनीकट बनाने, चम्बल का पानी समस्या ग्रस्त इलाकों में पहुंचाने, बांधों में चम्बल का पानी पहुंचाकर जल स्तर कायम करने जैसे उपाय करके स्थायी समाधान करना मुश्किल नहीं है।
इन दिनों चुनावी प्रचार के दौर में जब बातें विकास की खूब की जा रही हैं तब भी इस समस्या को अनदेखा किया जा रहा है। जबकि पानी की समस्या से जूझ रहे जिले के अधिकांश लोगों की नजर में तो पीने को पानी मिल जाए, यह ही विकास के मायने हैं।
इन सूखे कंठों के लिए देश-प्रदेश के तमाम मुद्दे गौण लगते हैं। उन्हें कोई सरोकार नहीं कि उनकी यह समस्या किस सरकार के स्तर की है, उनके लिए दैनिक जीवन की जरूरत पहले हैं। ताज्जुब होता है कि दैनिक जीवन की इस समस्या पर न कोई प्रत्याशी बोल रहा न किसी दल का नेता। इन दिनों चुनाव के मौके पर भी उनकी खामोशी बनी हुई है तो आगे उनसे समस्या समाधान की क्या उम्मीद कर सकते हैं।





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