गुढ़ाचन्द्रजी. श्रम कल्याण विभाग की ओर से १ मई को हरवर्ष विश्व मजदूर दिवस मनाकर उनके कल्याण के लिए बड़े लम्बे-चौड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन इन योजनाओं के लाभ से अधिकांश मजदूर दूर है। विभाग की ओर से मजदूरों को लाभ देने के कोई विशेष प्रयास नहीं किए जाते हंै।
इसी का मुख्य कारण यह है कि क्षेत्र के हजारों की संख्या में श्रमिक सात समंदर पार अपने परिवार के पेट पालने के लिए वर्षों से मेहनत मजदूरी कर रहे हैं। पेट की भूख मिटाने के लिए उन्होंने अपने मासूम बच्चों के साथ अपनी पत्नी को परिवार के भरोसे छोड़ रखा है। इस कारण मजदूरों के बच्चों की परवरिश के साथ पढ़ाई भी ढंग से नहीं हो पाती। क्षेत्र के मालूपाड़ा, आंधियाखेड़ा, मांचड़ी, भांवरा, गिदानी, गोठड़ा, लालसर, पाल, राजाहेड़ा, मोहचीकापुरा, राजपुर, बाड़ा सहित क्षेत्र के गांवों के हजारों लोग अपने परिवार की रोजी-रोटी कमाने के लिए सऊदी अरब के देशों में मजदूरी करते है। लेकिन इनके परिवारों के लिए भी सरकारी योजनाएं ना के बराबर होती है।
रोजाना मजदूरी कर मिटाते है पेट की भूख
अधिकांश मजूदरों को तो उनके कल्याण के लिए संचालित योजनाओं के बारे में आज तक पता नहीं है। वे तो अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए दिनभर तपती धूप मे मेहनत-मजदूरी करते है। सरकारी योजनाओं के धरातल पर नहीं उतरने से मजदूरों की स्थिति आज भी एक दशक पुरानी जैसी है। मजदूर आज भी दिनभर पसीना बहाने के बाद शाम को परिवार की रोटी का जुगाड़ करने के लिए मालिक का मुंह ताकता है। जब उसको परिवार को शाम की रोटी मिल जाती है तो फिर उसको अगले दिन की रोजी की चिंता सताती है। ना उनको सरकारी कर्मचारी की तरह छुट्टिया मिलती है और ना ही अन्य सुविधाएं। खास बात तो यह है कि १ मई का दिन मजदूर दिवस के रूप में घोषित है, लेकिन मजदूरों के लिए सामान्य दिन जैसा ही होता है।
नहीं है उद्योग-धंधे
सरकारी प्रयास नहीं होने से क्षेत्र में उद्योग-धंधों का अभाव है। इस कारण मजूदर ठाले बैठे रहते है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अगर सरकार उद्योग-धंधे स्थापित कर दे तो मजदूरों को विदेशों में कमाने नहीं जाना पड़े। हलांकि सरकार ने २००५ में मजदूरों को रोजगार देने के लिए मनरेगा योजना संचालित की। लेकिन उसमें भी श्रमिकों के हितों का ध्यान नहीं रखा जाता।





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