बल्र्ब- किसानों का महापर्व यानि अक्षय तृतीया आज से शुरू होगा। हर गांव-ढाणी और कस्बे में रियाण होगी। किसान बारिश के अनुमान लगाएंगे। बच्चों को खेती का प्रशिक्षण मिलेगा। खेत-खलिहान की बातें होगी और एक दूसरे को अच्छे जमाने की शुभ कामनाओं का संचार होगा। जमाना आधुनिक हो गया है,खेती पारंपरिक से वैज्ञानिक हुई है लेकिन आखातीज यानि अक्षय तृतीया का महत्व आज भी वैसा ही है। इस महापर्व से जुड़ी कई रोचक जानकारियों व परंपराओं पर विशेष रिपोर्ट-
बाड़मेर. अक्षय तृतीया जायका- गुळवाणी-खींच अक्षय तृतीया का जायका भी अलग है। खींच, गुलाब (गुळराब ) विशेष बनाए जाते है। इसमें बाजरे का खींच ही प्राथमिकता से बनता है जिसका सहभोज का आयोजन परिवार व गांव में किया जाता है। इसमें दही, दूध, घी के अलावा केर सांगरी और देसी सब्जियां ही बनती है।
आखातीज का खेल आंधळघेटा
आंधळघेटा अक्षय तृतीया का सबसे पसंदीदा खेल है। इसमें आंखों पर पट्टी बांधकर दौड़ लगाते हुए साथियों को पकडऩा होता है। इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण मानसिक दक्षता माना गया है।
अक्षय तृतीय के सगुन
एक्सपर्ट व्यू- एडवोकेट रूपसिंह राठौड़,चौहटन
अक्षय तृतीया पर सगुन विचार की परंपरा सदियों से है। मुख्य सगुन जो हर गांव में विचारे जाते है उनका आधार वैज्ञानिक भी रहता है।
पहला सगुन
कच्ची मिट्टी के चार बर्तन बनाकर उनमें पानी भरा जाता है। ये चार बर्तन ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद नाम से रहते है। जिस बर्तन में पानी पहले फूटता है उसमें भरपूर बारिश मानी जाती है। इसी क्रम में चारों बर्तनों को देखते है।
सगुन चिडि़या और तीतर
गांवों में चिडि़या और तीतर की आवाज पर सवेरे किसान ध्यान देते है। उत्तर दिशा में चिडि़या का सगुन अच्छा माना जाता है। इसी तरह सगुन चिडि़या दांयी और बोले तो उसको विशेष महत्व देते है।
खळा बनाने की परंपरा
बाजरा, मूंग, मोठ, तिल, ग्वार की फसलें यहां खरीफ में होती थी। इनके बीज खेत और घर के आंगन में रखे जाते है। इन बीजों को चिंटिया जिस दिशा में ले जाती है माना जाता है उस दिशा में अच्छा जमाना होगा।
ऊन से सगुन विचार
काली और सफेद दो ऊन को पानी में रखा जाता है। इसमें जो ऊन पहले डूब जाए उस हिसाब से माना जाता है कि काली ऊन मतलब अकाल डूबा और सफेद मतलब सुकाल डूबा।
खेती का पूरा प्रशिक्षण है अक्षय तृतीय पर्व
पशुपालन और खेती दो ही किसानों के जीवन के आधार रहे है। अक्षय तृतीया पर्व एक तरह से खेती का पूरा प्रशिक्षण है। बारिश से ठीक पहले किसान यह प्रशिक्षण देते रहे है। हाळी अमावस्या को पहले ही दिन सुबह खेतों में जल्दी पहुंचकर बच्चों को खेत में क्यारी बनाना, बुवाई करना, हल चलाना, बीजों का ज्ञान दिया जाता है। हल चलाने से लेकर बीज डालने का यह प्रशिक्षण देने के बाद साफा पहनकर बच्चे जब गांव में आते है तो उत्साह के साथ पहुंचते है। यही एक अवसर होता है जब बच्चों को गांव की रियाण( मुख्य सभा ) में ससम्मान बुलाया जाता है। साथ ही उनसे जाना जाता है कि किस तरह हल चलाया और कैसा लगा।
दूसरे दिन हवा का ज्ञान
दूसरे दिन यानि प्रथमा को इन बच्चों को हवा का ज्ञान दिया जाता है कि किस तरह की हवा चलने से मौसम में क्या परिवर्तन होगा और बारिश होगी या नहीं। साथ ही इन हवाओं से फसलों को कैसे बचाया जा सकता है।
अक्षय तृतीया को सगुन विचार
गांव की सभा में अक्षय तृतीया केा सगुन विचारे जाते है। इसमें बारिश के चार महीनो ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद में बारिश होगी या नहीं इसको लेकर बच्चों को भी ज्ञान दिया जाता है।
ज्योतिष- स्वयंसिद्ध मुहुर्त
अक्षय तृतीया मतलब जिसका क्षय नहीं है। इस तिथि का क्षय नहीं होने से वर्ष में एकमात्र इस दिन स्वयंसिद्ध मुहुर्त का योग दिया गया है। यानि इस दिन कोई भी शुभकार्य किया जा सकता है। यह अपने आम में शुभ मुहुर्त है। इसलिए इस दिन सर्वाधिक शादी-ब्याह के मुहुर्त होते है।
-पंडित सुनिल जोशी
बाड़मेेर में नियंत्रण कक्ष स्थापित
बाल विवाह की रोकथाम को लेकर कलक्ट्रेट परिसर में नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है। यहां 02982-222226-27 पर शिकायत की जा सकती है। नियंत्रण कक्ष में आने वाली शिकायतों के लिए रजिस्टर भी संधारित किया जाएगा।
शिकायत पर तुरंत होगी कार्रवाई
बाल विवाह रोकथाम को लेकर समस्त कार्मिकों को निर्देश जारी कर दिए है। जिला मुख्यालय पर कंट्रोल रुम स्थापित हैं। यहां पर बाल विवाह से सबंधित शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
नीरज मिश्र, उपखण्ड अधिकारी, बाड़मेर





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