प्रतापगढ़. शहर की शान माने जाने वाला दीपेश्वर तालाब का सौन्दर्य हर किसी को अपनी ओर आकर्षिक करता है। बड़ी संख्या में लोग यहां घूमने फिरने के लिए आते हैं। नगरपरिषद ने भी यहां कई विकास कार्य कराए हैं, जिससे यहां का सौन्दर्य और बढ़ा है लेकिन वे नाकाफी है और तालाब में गहरीकरण सहित काफी सुधार की आवश्यकता है। तालाब में पानी के आवक के मार्ग पर फैलता अतिक्रमण और विकसित होती कॉलोनियां पानी की आवक को अवरूद्ध कर रही है। कहीं ऐसा न हो कि इस अनदेखी का परिणाम आने वाली पीड़ी को भोगना पड़े और उन्हें इस तालाब को प्राकृतिक बारिश से नहीं, अपितु कृत्रिम संसाधनों के जरिए सराबोर करना पड़ेगा। ऐसी विकट स्थिति से बचने के लिए नगरपरिषद को मशक्कत करनी होगी। तालाब शहरवासियों के लिए पर्यटन स्थल ही नहीं वरन हजारों लाखों जलीय जीव जन्तुओं एवं पक्षियों की शरणस्थली भी है। ऐसे में भी इसकी अनदेखी शहरवासियों के साथ उन बेजुबान जीव जन्तुओं और पक्षियों के साथ भी अन्याय होगा।
कुंवर दीपसिंह की देन है तालाब: प्रतापगढ़ रियासत के महारावत सामन्तसिंह के कुंवर दीपसिंह ने 1857 के आसपास बनवाया दीपेश्वर तालाब
ऐसे हुआ तालाब का निर्माण: रियासत के महारावत सामन्तसिंह के कुंवर दीपसिंह ने दीपेश्वर तालाब का निर्माण करवाया। तालाब निर्माण के पीछे की कहानी बताते हुए इतिहासकार मदन वैष्णव कहते हैं कि कुंवर दीपसिंह नगर की ऐराव नदी के किनारे से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि वहां एक गाय खड़ी थी। जिसके स्तनों से दूध झर रहा था। दीपसिंह ने वहां जाकर देखा और मिट्टी हटाई तो वहां एक शिवलिंग दिखाई दिया। जिस पर उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया। जब मंदिर का निर्माण हो गया, तब बारिश के दिनों में उपरी हिस्से से तेज पानी के बहाव से मंदिर को नुकसान हो सकता था। मंदिर की सुरक्षा की दृष्टि से दीपसिंह ने उपरी हिस्से पर तालाब का निर्माण करवाया। इस तरह मंदिर एवं तालाब आज दीपसिंह की अनुपम सौगात के रूप में जाने जाता है।
धर्म की धरा से सराबोर है तालाब:
दीपेश्वर तालाब प्रतापगढ़ शहर के लिए एक सौगात है। दीपेश्वर महादेव, गुप्तेश्वर महादेव, शंखेश्वर पाŸवनाथ, दादावाड़ी, ये ऐसे धार्मिक स्थल है जहां कभी भी चले जाओ आत्मिक शांति एवं सकून मिलता है। इन सभी के साथ दीपेश्वर तालाब की साहिल से टकराती मौजे किसी भी तनाव को शांत करती है। गत 10 वर्षो में दीपेश्वर तालाब पर कुछ विकास कार्य किया गया है, लेकिन वह कुछ नाकाफी हैं और तालाब को ओर विकास की दरकार है, ताकि यहां का स्वरुप और निखर सके।
कब-कब हुआ गहरीकरण
प्रतापगढ़ का ऐतिहासिक तालाब आज जिस मनोरम स्थिति में है। इसने भी कई बार भयंकर सूखे के दंश झेले हैं। विक्रम सम्वत 2003 में भयंकर अकाल के चलते तालाब पूरी तरह से सूख चुका था। साहित्यकार एवं कवि भागीरथ राकेश बताते है कि उस समय पूरे क्षेत्र में अकाल कि स्थिति बन चुकी थी। तब राज वैद्य राधेलाल शर्मा देव स्थान विभाग में निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। तब इन्होंने गणपतलाल उपाध्याय की देखरेख में तालाब का गहरीकरण कराया गया था। उसके बाद जब 1995 से 2001 तक में लगातार अल्पवृष्टि एवं निरन्तर पेटे में मिट्टी जमा होने से तालाब की गहराई सीमित हो गई थी। 1998 में स्थिति यह हो गई थी कि तालाब को आसानी से पैदल चल कर पार किया जा सकता था। ऐसे में पूर्व तत्कालीन पार्षद एवं अधिवक्ता गिरीराज जोशी ने एक बार फिर जन सहयोग से तालाब गहरीकरण का बीड़ा उठाया था। तकरीबन 20-22 दिन निरन्तर रात-दिन गहरीकरण का कार्य चलाया गया। प्रतापगढ़ में पहली बार हिताची मशीन तालाब में गहरीकरण के लिए उतारी गई थी। मेले जैसे माहौल रहा। तालाब से निकाली गई मिट्टी को डिस्पोज करने के लिए क्षेत्र के काश्तकारों को मिट्टी नि:शुल्क उपलब्ध कराई गई। आज जो पानी तालाब में भरा है वह 2001 में किए गए गहरीकरण का फल है।
ये हो सकता है समाधान
यदि समय रहते नहीं चेते तो तालाब ऐसे ही तिल-तिल कर अपना वजूद खो देगा। और शहरवासी एक खूबसूरत ऐतिहासिक और सकून से वंचित हो जाएंगे।
1- तालाब में आने वाले तमाम बरसाती नाले जो सिमटते जा रहे हैं, उन्हे संरक्षित कर सिमटने से रोका जाए।
2- अरनोद और बांसवाड़ा मार्ग के मध्य स्थित एक बड़ा भू-भाग जहां से बरसाती पानी एकत्र होकर तालाब में आता है। इस क्षेत्र को अधिगृहित किया जा सकता है।
3- गटिया खाळ (नाला) को गहरा कर दीपेश्वर तालाब से जोड़ा जाए।
4- आईटीआई व सर्किट हाउस की दीवार तक तालाब को गहरा कर बढ़ाया जाए।
यह होगा फायदा
गहरा होने से पानी स्वच्छ रहेगा।
जल आधारित पशु पक्षियों का आगमन होगा
पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
ग्रीष्म ऋतु में सूखेगा नहीं। पानी से बदबू नहीं आएगी।
वर्ष पर्यन्त नौकायन की भी है संभावना
नगरपरिषद की ओर से अब तक हुए कुछ विकास कार्य
सीढिय़ों एवं पाल का रखरखाव
धौलपुर पत्थर की छतरियों
का निर्माण हुआ
तालाब की उत्तरी दिशा एवं पूर्वी दिशा में सडक़ निर्माण हुआ
तालाब के मध्य में भगवान शिव की आकर्षक प्रतिमा की स्थापना हुई
दक्षिण दिशा में घाट निर्माण
तालाब के बीच में फव्वारे
गौरव पथ निर्माण





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