कोटा. हाड़ौती के जंगलों में डायनासोर ( Dinosaurs ) ही नहीं जिराफ ( Giraffe ) भी मौजूद थे। पुरातत्ववेत्ताओं ने इस इलाके के प्रागैतिहासिक ठिकानों से इसके पुख्ता सबूत खोज निकाले हैं। शैलचित्रों ( rock paintings ) की व्यापक शृंखला के डॉक्यूमेंटेशन के दौरान गरड़दा बांध के डूब क्षेत्र में 10 हजार साल से भी ज्यादा पुराना गेरुएं रंग से बना जिराफ का शैलचित्र मिला है। हाड़ौती में शैलचित्रों की अकूत संपदा मौजूद है।
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गरड़दा बांध के डूब क्षेत्र में धाखा, सुई का नाला, नलदेह, छापरिया, नचला, हाथी डूब, नारडा, रामलोई, डूंगरी नाला और इसके आसपास के इलाके में तो मानवीय सभ्यता के शुरुआती विकास के हजारों साल पुराने निशान आज भी मौजूद हैं। इस इलाके की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक विकसित हुई सभ्यता की निशानियां निरंतरता में मौजूद हैं। जिनमें शुरुआती दौर में रेखाओं के जरिए बनाई मानवीय आकृतियों से लेकर विशालकाय सींग वाले जानवरों और लम्बी गर्दन वाले जिराफ का शैलचित्र भी मौजूद है।
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हो रहा था समाज का विकास
डॉ. आहूजा बताती हैं कि जिराफ के आस-पास बड़े-बड़े सींग वाले दुधारू पशुओं के शैलचित्र भी मौजूद हैं। इनके सींग आमतौर पर पाए जाने वाले पशुओं से काफी बड़े हैं और यह खुले घूम रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय के इंसान ने इन्हें बांधकर रखने की परम्परा शुरू नहीं की थी। हालांकि इसके पास ही हाथों में हाथ डाले पांच मानवीय आकृतियों को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस दौर में समाज की स्थापना शुरू हो चुकी थी। यह मनुष्यों की एकता और संगठनात्मक क्षमता के विकास के सबसे जीवंत प्रमाण हैं।
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इनका ने किया डॉक्यूमेंटेशन
शैलचित्रों की निशानियों को जिंदा रखने के लिए इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आट्र्स (इनका) ने इनका डॉक्यूमेंटेशन करने के लिए सेंटर के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. जीएल बादाम, प्रोजेक्ट ऑफिसर राहास मोहंती, जेडीबी कॉलेज की पूर्व प्राचार्या और इतिहासविद डॉ. सुषमा आहूजा, भूगर्भ शास्त्री रितेष पुरोहित और आर्टिस्ट राजेंद्र सिंह की टीम गठित की थी। डॉ. आहूजा बताती हैं कि डॉक्यूमेंटेशन के दौरान टीम को गरड़दा डैम के पास ही एक बड़े पैच पर जिराफ का शैलचित्र भी मिला। मुड़कर देखता इतिहास डॉ. आहूजा ने बताया कि इस शैलचित्र की दो बड़ी खासियत हैं।
पहली यह कि इसके पीछे उत्कीर्ण शैली में पत्थर को खुरच कर जिराफ का चित्र बनाया गया और फिर उसके ऊपर गेरुएं रंग से एक और शैलचित्र बनाया गया। इससे पता चलता है कि इस इलाके में लंबे समय तक जिराफ मौजूद रहे होंगे। जिसे पाषाण काल के आदिमानव की दो पीढिय़ों ने देखा होगा। मध्यपाषाण काल में बनाए गए गेरुएं रंग के शैलचित्र में जिराफ की चारों टांगें और पूंछ एकदम स्थिर है, जबकि लंबी गर्दन एकदम ऊपर उठी हुई है और सिर पीछे की ओर मुड़ा हुआ है। इससे लगता है कि यह अपने पीछे हो रही किसी घटना को देख रखा था। जबकि पत्थर खरोंच कर बनाया गया शैलचित्र इसके नीचे दबा हुआ है।
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मिल चुकी है डायनासोर की मौजूदगी
पहली बार डायनासोर की मौजूदगी के सबूत भी हाड़ौती में ही मिले थे। इतिहासकार डॉ. जगतनारायण श्रीवास्तव के निर्देशन में शोधार्थी डॉ. तेजसिंह ने रावतभाटा के पास श्रीपुरा गांव में 75 हजार साल से भी ज्यादा पुराना उत्कीर्ण शैली में बना डायनासोर का शैलचित्र खोजा था। 24 सेंटीमीटर लम्बा यह शैलचित्र सैरोपोडा श्रेणी के ओपिस्टोकोलिकाडिया स्कार्जन्स्किी डायनासोर से मिलता है।





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