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महाराणा भूपाल हॉस्पिटल में आग, करीब 50 मरीजों की बचाई जान

भुवनेश पण्ड्या

उदयपुर . आरएनटी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महाराणा भूपाल हॉस्पिटल में इमरजेंसी आईसीयू के ठीक पीछे स्थित रेडियोलॉजी विभाग के बेसमेंट में मंगलवार दोपहर करीब 12.15 आग लग गई। चिकित्सकों व स्टाफकर्मियों ने तत्परता दिखाते हुए सभी मरीजों को शिफ्ट किया। आग और धुएं की घुटन से करीब 50 मरीजों की जान बचाई गई। आग से बेसमेंट में पड़े मेडिको लीगल एक्सरे व अन्य रिकार्ड खाक हो गए। आग का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है। हॉस्पिटल प्रशासन ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है।

हॉस्पिटल के वार्ड 102 यानी इमरजेंसी आईसीयू के पीछे रेडियोलॉजी विभाग के बेसमेंट में लगी आग से अधिकांश वार्डों में धुआं फैल गया। ऐसे में इमरजेंसी आईसीयू में मौजूद स्टाफ ने डॉ मुकेश बडजात्या व डॉ सीपी मुद्गल को सूचना दी। इस पर मुद्गल ने वार्ड में लगे अग्निशमन यंत्र से आग को आईसीयू की ओर बढऩे से रोका। इससे पहले उन्होंने इस वार्ड के रिकॉर्ड रूम में रखी अलमारियों को हटाया, ताकि आग को बढऩे से रोका जा सके । इधर, बेसमेंट में आग फैलने से धुआं बढ़ रहा था। आग की सूचना से वार्ड में अफरा-तफरी मच गई। इसी बीच, चिकित्सकों और स्टाफकर्मियों ने मरीजों को शिफ्ट करना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में पहुंचे दमकलकर्मियों ने आग पर काबू पाया। धुएं से इमरजेंसी आईसीयू, कैंसर विभाग, कॉरिडोर, रेडियोलॉजी, एक्सरे विभाग, गायनी ओटी, गायनी आईसीयू, सर्जिकल वार्ड आठ में मरीजों का दम घुटने लगा। चिकित्सकों और स्टाफकर्मियों ने मरीजों को अन्य वार्डों में शिफ्ट किया।

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प्रथमदृष्टया आग शॉर्ट सर्किट से लगना बताया जा रहा है। आग लगने के कारणों की जांच के लिए कमेटी गठित की गई है। संतोष की बात यह रही कि किसी मरीज को नुकसान नहीं हुआ। स्टाफकर्मियों और चिकित्सकों की सजगता, तत्परता और सहयोग से स्थिति सामान्य हो पाई। फायर फाइटिंग सिस्टम को और बेहतर करेंगे। जो कमी हैं, उसे जल्द दूर करेंगे।

डॉ डीपी सिंह, प्राचार्य आरएनटी मेडिकल कॉलेज
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छह दमकल पहुंची

- आठ फेरे लगाए दमकल ने

- 20 मिनट में आग पर काबू पाया

- 50 दमकल, होमगार्ड, चिकित्सा कार्मिक जुटे आग बुझाने में

- 50 से 55 मरीजों की बची जान

- फायर इंटीग्यूशर आए काम, पर सिस्टम फेल

- अस्पताल का फायर सिस्टम दिखावा, नहीं फेंका पानी

- 20 खिड़कियों के फोड़े कांच

- चार दरवाजे तोड़

- प्रारंभिक जांच में आग शॉर्ट सर्किट से

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ये थी कमियां

- भवन में पर्याप्त खिड़कियां होने के बावजूद कांच लगे होने से हवा आने-जाने की व्यवस्था नहीं होने से दम घोंटू वातावरण बना।

- लाखों खर्च कर लगाए गए विद्युत उपकरण बेकार इसलिए हुआ शॉर्ट सर्किट

- बड़ी मशीनों के अनुरूप पावर प्लग व वायर नहीं

- हॉस्पिटल का प्रवेश द्वार बेहद सकड़ा।

- बिजली के रखरखाव की खुली पोल, सूरत में लगी आग के बाद भी सिस्टम को सही नहीं किया गया।

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मिनट टू मिनट

- 12.13 पर आग लगी

- 12.18 बजे दमकल को फायर कॉल

- 12.31 बजे चेतक क्षेत्र से दो दमकल मौके पर

- 12.40 बजे अशोकनगर से भी दो दमकल पहुंची

- 12.55 बजे आग पर काबू

- 2.20 बजे तक आग और धुएं पर काबू

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दो दमकल फंसी दुर्गा नर्सरी रोड पर

आग पर काबू पाने के लिए मादड़ी स्टेशन से निकली दो दमकल दुर्गा नर्सरी रोड पर जाम में फंस गई। यहां एक ओर सडक़ खोद रखी है।
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वॉल्व खोला तो पानी नहीं निकली ‘हवा’

उदयपुर . महाराणा भूपाल हॉस्पिटल में दो करोड़ रुपए की लागत से चार वर्ष पूर्व लगाया गया फायर फाइटिंग सिस्टम पूरी तरह से फेल साबित हुआ। आग लगने पर यह सिस्टम अपनी पाइप लाइन से एक बूंद पानी नहीं फेंक पाया। बहरहाल, चार दिन पूर्व मॉक ड्रिल के नाम पर कार्मिकों को दिया गया प्रशिक्षण बचाव-राहत में काम आया।

वर्ष 2015 में करीब एक करोड़ 82 लाख रुपए खर्च कर यह पूरा सिस्टम तैयार किया गया था। इसमें 180 हाइड्रेंड पाइंट लगाए गए। बकायदा इस सिस्टम के लिए अलग-अलग पारी में छह कार्मिक लगाए गए हैं। हॉस्पिटल के पम्प स्टेशन पर इनमें से दो-दो का चौबीस घंटे रहना जरूरी है। यह सिस्टम सार्वजनिक निर्माण विभाग की इलेक्ट्रिक विंग ने लगवाया है।

लगे हैं 30 फायर एक्सस्टिंग्विशर

हॉस्पिटल परिसर में जगह-जगह पर 30 फायर एक्सस्टिंग्विशर लगाए गए हैं, जो दो प्रकार के हैं। सीओटू एक्सस्टिंग्विशर में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस भरी रहती है जबकि एबीसी एक्सस्टिंग्विशर में पाउडर होता है। सीओटू वार्डों के समीप व बरामदों में लगे हैं, जबकि एबीसी हॉस्पिटल के खुले में लगाए गए हैं ताकि मरीजों को इससे नुकसान नहीं हो। वर्तमान में जनाना हॉस्पिटल के समीप एक फायर स्टेशन है, जहां से वाटर सप्लाई होती है।

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यह हुआ लेकिन काम नहीं आया

गत 12 फरवरी को आरएमआरएस की बैठक में संभागीय आयुक्त भवानीसिंह देथा ने निर्देश दिए थे कि फायद सिस्टम को जांच कर अपग्रेड करवाया जाए, लेकिन मेडिकल कॉलेज एवं चिकित्सालय प्रशासन की लापरवाही से यह अपग्रेड नहीं हो पाया। कुछ दिन पूर्व हॉस्पिटल अधीक्षक ने आरएनटी प्राचार्य को चि_ी लिखकर फायर फाइटिंग सिस्टम की पूरी फाइल मांगी थी, लेकिन वह अब तक नहीं मिल पाई है। हॉस्पिटल प्रशासन में किसी को यह जानकारी नहींं है कि यह किस कंपनी ने लगाया है और इस पर कितना खर्च हुआ है।

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केवल यह काम आया
आग बुझाने का कुल 1350 कार्मिकों, नर्सिंगकर्मियों और चिकित्सकों में से करीब 1 हजार को प्रशिक्षण दे चुके हैं। वर्तमान में 6 डिप्लोमाधारी फायरमैन मौजूद है, जो आग बुझाने का काम करते हैं। प्रशिक्षण के बूते ही कार्मिकों ने आग लगने पर बचाव-राहत कार्य किया।

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आग कैसे लगी, यह जांच का विषय है, लेकिन मैं चिकित्सकों सहित पूरे स्टाफ की प्रशंसा करूंगा कि इस विपरीत परिस्थिति में सभी ने एक जुटता से मरीजों की जान बचाई। हमें फायर सिस्टम लगाने वाली कंपनी का नाम-पता नहीं है, लेकिन चार दिन पहले मॉक ड्रिल में पाइप से पानी निकाल कर जांच की गई थी। हो सकता है कि जो कार्मिक उस समय वहां मौजूद थे, वे सिलेंडर्स लेकर आग बुझाने दौड़ पड़े और वहां से पानी का फ्लो वॉल नहीं खोल पाए हों।

डॉ लाखन पोसवाल, अधीक्षक महाराणा भूपाल हॉस्पिटल
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दहशत और अफरा-तफरी में गुजरे दो घंटे, जान का नुकसान नहीं होने पर ली राहत की सांस

- चिकित्सालय परिसर में धुएं से हुई घुटन
- चिकित्सकों एवं स्टाफ की तत्परता से टला बड़ा हादसा

- खली वेंटिलेशन की कमी, तोडऩे पड़े शीशे

उदयपुर . महाराणा भूपाल हॉस्पिटल के मुख्य पोर्च और अन्दर गैलरी में धुआं ही धुआं। कोई मरीज को स्ट्रेचर पर लेकर दौड़ता दिखा तो किसी ने मरीजों को कंधे पर उठा रखा था। किसी ने मरीज की जान बचाने के लिए उसे व्हीलचेयर बिठाकर और हाथों से उठाकर बाहर की राह पकड़ी थी। कोई मरीजों को बाहर निकालने के लिए चिल्ला रहा था तो कोई शीशा, दरवाजा और खिड़कियां तोड़ता दिखा। दमकलकर्मी पानी के पाइप लेकर दौड़ते दिखे तो चिकित्साकर्मी भी तत्परता बचाव कार्य में लगे थे। अफरा-तफरी के इस माहौल में कुछ लोग मरीजों के साथ सीढिय़ों के रास्ते छत तक चले गए। उनकी चीखें सुनकर बीएसएफ जवान उन्हें नीचे उतारने लगे। करीब डेढ़ घंटे में आग पर काबू पाया गया तब तक कीमो थैरेपी सेंटर का हिस्सा भी लपटों की चपेट में आ गया था। गनीमत यह रही कि इस अग्निकांड में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन अस्पताल में वेंटिलेशन की कमी खली।
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गंभीर मरीजों को लेकर भागे डॉक्टर
चारो ओर धुआं फैलने पर गंभीर मरीजों को लेकर चिकित्सक भागने लगे। अन्य कार्मिकों ने भी मरीजों को विभिन्न वार्डों से बाहर निकालने में मदद की। जैसे-जैसे धुआं फैलता गया, वैसे-वैसे मरीजों को अन्य वार्डों में शिफ्ट करते रहे। देखते ही देखते एक के बाद एक वार्ड खाली होते गए। खास बात यह रही कि जो वार्ड खाली हुए वहां पर आठ सदस्यीय चिकित्सकों की टीम गई कि कोई मरीज या परिजन बचा तो नहीं है। शिफ्ंिटग के बाद कुछ वार्डों में क्षमता से अधिक मरीज होने पर परिजन कुछ देर तक उलझे भी। चिकित्सकों ने जैसे-तैसे समझाइश कर उन्हें शांत किया।

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दम घुटने पर तोड़े खिड़कियों के कांच

आग बुझने के बाद चारो ओर धुआं फैलने पर हर किसी का दम घुटने लगा। धुआं ऊपरी मंजिल तक पहुंच गया जिससे हर किसी के नाक पर हाथ या रूमाल था। जब कलक्टर मौके पर पहुंची तो उन्हें भी दुपट्टे से अपना मुंह ढकना पड़ा। घुटन के बीच कर्मचारियों, चिकित्सकों और दमकल कर्मियों ने कई खिड़कियों के कांच फोड़े और दरवाजे तोड़े तो एक जगह पर दीवार का एक हिस्सा ढहाना पड़ा।

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रह-रहकर सुलगती रही आग

दमकलकर्मियों ने कुछ ही देर में आग पर काबू पा लिया था, लेकिन बायोमेडिकल वेस्ट, रूई, बेंडेज रोल के कारण रह-रहकर आग सुलगती रही। पानी का छिडक़ाव कर पूरे सामान को बाहर निकाला गया। काफी रिकार्ड व सामान आग की भेंट चढ़ गया, वहीं बचा सामान पानी से बेकार हो गया।
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फैली अफवाह
आग बुझने के करीब दो घंटे बाद किसी ने अफ वाह फैला दी कि इमरजेंसी के करीब फिर आग लग गई है। ऐसे में प्राचार्य डॉ डीपीसिंह, डॉ ललित रेगर आदि मौके की ओर दौड़ पड़े। वहां पहुंचने पर पता चला कि कोई आग नहीं लगी है, तो उन्होंने राहत की सांस ली।

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यहां शिफ्ट किया मरीजों को
- गायनिक आईसीयू 11 डी से 15 रोगी वार्ड 8 पोस्ट ऑपरेटिव में

- वार्ड नम्बर 101 और 102 से 19 रोगी केजुअल्टी आईसीयू में
- मेडिकल आईसीयू में 4 मरीज शिफ्ट किए

- कैंसर वार्ड के 15 मरीज मेडिसिन वार्ड नम्बर 5 और 6 में शिफ्ट किए गए
यह बनाई जांच कमेटी

- एक्सईएन पीडब्ल्यूडी- आरसी मेहता
- एक्सईएन पीडब्ल्यूडी इलेक्ट्रीक- सुरेश मेघवंशी

- विभागाध्यक्ष कैंसर विभाग डॉ नरेन्द्र राठौड़
- विभागाध्यक्ष मेडिसिन डॉ महेश दवे

- विभागाध्यक्ष सर्जरी डॉ डीके शर्मा
(कमेटी आग लगने के कारण एवं नुकसान पता लगाएगी)

बीस वर्षों से पड़ा था रिकॉर्ड

जिस कक्ष में आग लगी, वहां मेडिको लीगल एक्सरे, विभिन्न प्रकार का रिकॉर्ड और कबाड़ पड़ा हुआ है। जरूरत पर ही इसे खोला जाता है। कुछ दिन पूर्व अधीक्षक डॉ लाखन पोसवाल ने निरीक्षण के दौरान इसे खुलवाया था, तब उन्हें काफी देर इंतजार करना पड़ा था, क्योंकि इसकी चाबी आसानी से नहीं मिलती है।

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किसी ने आग तो नहीं लगाई ?
चिकित्सकों से लेकर स्टाफ में यह चर्चा भी थी कि किसी ने जान-बूझकर आग तो नहीं लगाई क्योंकि कानूनी मसलों से जुड़े एक्सरे व कागज यहां रखे जाते रहे हैं। इसलिए ये काफी महत्वपूर्ण थे। हालांकि हॉस्पिटल में बारिश पूर्व रखरखाव को लेकर बिजली का काम चल रहा था। सुबह 9 से 12 बजे तक विभिन्न वार्डों में बिजली बंद थी। बिजली शुरू होने के कुछ ही देर बाद यह हादसा हो गया। इसलिए प्रशासन इसका कारण शॉर्ट सर्किट ही बता रहा है।

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एक घंटे बाद पहुंची कलक्टर

हादसा करीब सवा बारह बजे हुआ, लेकिन कलक्टर आनन्दी करीब एक घंटे के बाद 1.15 बजे हॉस्पिटल पहुंची। हालांकि इससे पहले अतिरिक्त कलक्टर संजय बासु मौके पर पहुंच गए थे, लेकिन घटना स्थल पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक गोपालस्वरूप मेवाड़ा और हाथीपोल थानाप्रभारी आदर्शकुमार भी आग बुझने के बाद पहुंचे। इसके अलावा पुलिस का कोई आला अधिकारी नजर नहीं आया।
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- डॉ सीपी मुद्गल: मैं उस समय वहीं था, जब आईसीयू के पीछे के हिस्से में आग फैलने लगी थी। दौडक़र मैंने फायर इंटीग्यूशर उठाया और उसे खोल आग बुझाने के प्रयास किए, एक के बाद एक तीन इंटीग्यूशर खाली कर दिए, लेकिन आग बुझी तो नहीं लेकिन कुछ काबू जरूर हुई। इसके बाद हमने दौडक़र मौजूद मरीजों को जीवन रक्षक उपकरणों व दवाइयों के साथ ही बाहर ले जाना शुरू किया। इसी आपा-धापी में एक हाथ जल गया, लेकिन इस अफरा तफरी के माहौल में तसल्ली ये रही कि किसी मरीज को नुकसान नहीं हुआ।

- कैंसर वार्ड के जिन कार्मिकों ने लोगों को धुएं से बचाया इनमें से मनोजकुमार जीनगर मेल नर्स ग्रेड फस्र्ट ने बताया कि धुआं निकलने लगा तो डॉ अंकुर शर्मा व डॉ शशांक कोठारी ने पूछा कि ये धुआं कहा से आ रहा है। इस पर मैं उठा और देखा तो तेजी से लपटे नीचे से उपर आ रही थी, फिर मैने एक्सटेंशन पर फोन कर कहा कि जल्द से अधिकारियों को फोन पर बताओ और फायर ब्रिगेड को फोन कर दो। फिर धुआं बढऩे पर पूरी टीम जुट गई कि कैसे मरीजों को निकाला जाए। हमने दोनेां चिकित्सकों ने अपने मुंह पर रूमाल बांधा। फायर ब्रिगेड की जो ट्रेनिंग ली थी, उसके आधार पर मुंह पर गिला रूमाल बांधा और फीमेल वार्ड में मेल नर्स शिशुपाल सहित कमला, रीना व नैना सिस्टर पहुंचे और मरीजों को निकालने लगे।

- 102 वार्ड में मरीज बंशीलाल के साथ थी चित्तौडगढ़़ की सविता। सविता ने पत्रिका को बताया कि स्टोर रूम से गंध आने लगी थी, पूछने पर पता चला कि पीछे आग लगने लगी है। ऐसे में फिर दौडक़र स्टाफ की मदद से हमने लोगों को बाहर निकलने में मदद की। सभी डर गए थे कि यदि आग ज्यादा फैल गई तो क्या होगा।

- कैंसर वार्ड में भर्ती उदयपुर की मरीज कंचन के साथ आई उनकी बेटी अनिता ने बताया कि वह जहां लेटी थी, उसके पास से ही पूरे वार्ड में धुआं फैलने लगा, सब चिल्लाने लगे थे, ऐसे में जैसे-तैसे मम्मी को घसीट कर बाहर निकाला, क्योंकि उनकी मां उठ नहीं सकती थी। कुछ चिकित्सकों ने मदद की। लेकिन घटना के समय से ही दम घुटने लगा था, जो अब तक हो रहा था, कुछ पल के लिए आंखों से दिखना बंद हो गया था।

- होमगार्ड जयङ्क्षसह का इस हॉस्पिटल में आखिरी दिन था, उसने बताया कि जैसे ही आग लगी तो वह लोगों को खींच-खींच कर बाहर निकालने लगा था। बकौल जयसिंह करीब 20 लोग ऐसे थे जो छत से कूदने की तैयारी में थे, इनमें कुछ मरीज भी थे, लेकिन तेजी से ऊपर जाकर देखा तो कुछ लोग जो दीवार पर लटक रहे थे, उन्हें वहां से वार्ड छह के द्वार से बाहर निकाला।

- सुरक्षाकर्मी पवनकुमार ने बताया कि जब आग लगी तो वह छह नम्बर वार्ड में थे, बोले कि मैं दौडक़र वहां गया और जैसे-तैसे मरीजों को निकालने लगा, लेकिन इसी भाग दौड़ में आग ने उनके दोनों हाथ चपेट में ले लिए। उनके दोनों हाथ जलने के बाद भी वह पहले मरीजों को निकालने में लगे थे।

- प्रतापगढ़ जिले के बरखेड़ा से शांतिबाई को लेकर आए थे बाबुलाल धानका। पत्नी शांतिबाई का कैंसर का उपचार चल रहा है यहां। पति बाबुलाल ने बताया कि आग लगने के बाद धीरे-धीरे धुआं बढ़ता जा रहा था। जैसे-तैसे बाहर निकलने का प्रयास किया, और इस अफरा तफरी में निकलने मे ंसफल हो गए।

- राजमणी व्यास अपनी मां शांतादेवी को भीलवाड़ा से लेकर कैंसर के इलाज के लिए आई थी, वह बोली ...मैं आग लगने के बाद बाहर गई तो धुआं देखा और पता चला कि बाहर हल्ला होने लगा है, तब देखा कि निकले कैंसे, सिस्टर को सुई निकालने के लिए बुलाया। फिर हम दौडक़र बाहर आ गए। माहौल बहुत डराने वाला था।



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