एेसी तस्वीर दुबारा न हो, कभी नहीं...
ओम माली(फोटो जर्नलिस्ट)
बावड़ीकला चौहटन ( बाड़मेर)
मैं यहां बावड़ी कला के श्मशानघाट में खड़ा हूं ...एक हाथ में कैमरा और दूसरे में वीडियो के लिए मोबाइल...ईश्वर से कह रहा था एेसी तस्वीर दुबारा कभी मत दिखाना...इतना भयावह व कलेजा कांपने वाला दूश्य..मेरे सामने एक चिता है..जिस पर छह शव लाकर रख दिए गए हैं। इसमें से मां के साथ पांच बेटियां फूल सी मासूम कलियां..। चेहरे पर वो ही रंगत और वही मुस्कान...। मानो अब बोले या अब बोले....। मां की गोद के पास में एेसे सोई हुई जैसे उसके आंचल में इन्हें गहरी नींद आ गई हो। कल दुपहरी तक ये बेटियां खेत के आंगन में चहक रही थीं। खेल रही थी अपने मन के खेल..। पांचों 3 से 13 की उम्र की बहनें..., एक दूसरे पर जान छिड़कती..। रूठना..मनाना..लडऩा..मिलना और हंसना..हंसाना। तभी तो चहकता था इस पूरे परिवार का आंगन..। बताते हैं मां की आंखों में भी नहीं खटकती थी इसीलिए तो इनको गुडि़या सा तैयार करके रखती थी। आस पड़ौस के लोग बोलते है इतनी प्यारी थी ये कलियां कि हर घर में दुलार पाती थीं। हां, इन बेटियों को एक शिकायत थी जो शायद सारे गांव की जुबान पर आज थी..मां-पिता का झगड़ा। पर इस झगड़े में भी इनकी मुस्कान कई बार सुलह की स्थितियां लाई। पास खड़ा एक जना बोला अभी स्कूल खुलने वाले हैं। बड़ी बेटी के 92 प्रतिशत बने थे, अन्य तीनों भी पढ़ाई में अव्वल थीं। चौहटन की एक प्राइवेट स्कूल में पढती थी। वे किताबें-बस्ते लेकर आई हैं,पर इनके बस्ते तो पहले ही बिखर गए। दो दिन पहले जो अनबन हुई उससे मां का कलेजा इतना पत्थर हो गया कि उसने जिन बेटियों को सुबह तक दुलार किया था उनको पता नहीं कैसे एक-एक कर टांके में फेंक दिया। सोच जवाब दे रही है कि 13 साल की संतोष को मां ने टांके में कैसे फेंका होगा..क्या वो रोई चिल्लाई नहीं..कैसे मां की ममता सूख गई जब 11 साल की ममता को धक्का दिया। 9 साल की मैना को धकेलते हुए मां का मन कैसे माना और वो भी तो टांके में पडऩे पर तड़पी होगी। सात साल की हंसा जिसको हंसते-खेलते देख मां के चेहरे पर खुशी आती थी अपने दिल पर पत्थर रखकर किस तरह टांके में पटका होगा और तो और महज 3 साल की नन्हीं सी हेमलता....यह भी नहीं समझ पाई होगी मां उसे कहां ले जा रही है? मां...तेरे कलेजे हुए पत्थर में शर्तिया कोई गहरा राज, दु:ख और संवेदना थी। तू नहीं चाहती थी कि इस दुनियां में हमें किसी और के भरोसे छोड़ जाए तभी तूने यह कदम उठाया होगा...पर तेरा यह कदम कत्तई ठीक नहीं है..कभी नहीं हो सकता। हम बेटियां हैं जीना चाहती थी..तेरे साथ..जीवन के संघर्ष का यह अंत अपराध है मां..।
मेरे सवालों के न मेरे पास जवाब है न मेरे आस-पास खडे़ लोगों के पास..कोई झगड़ालू पति ..कोई अन्य घरेलू कलह तो कोई कह रहा है बेटा नहीं होना वजह थी लेकिन यह बात सच है कि इन कलियों का कोई कसूर नहीं था..एेसी तस्वीर दुबारा न हो...बस, कभी नहीं...।





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