अलवर.alwar nikay chunav news नगर परिषद की लचर कार्यप्रणाली के चलते वर्तमान में सभापति पद की जनता की नजर में ज्यादा अहमियत नहीं रही हो, लेकिन पूर्व में सभापति पद का क्रेज इस कदर था कि जिले में दो नेता विधायक का चुनाव जीतने के बाद सभापति बनने के लिए पार्षद का चुनाव लड़े और दोनों ही हार गए। दूसरी ओर नगर पालिका व नगर परिषद में पार्षद और सभापति बने कोई भी नेता आज तक विधानसभा की दहलीज पार नहीं कर पाया। वहीं छात्रसंघ चुनाव लडकऱ कई युवा विधायक ही नहीं मंत्री पद पाने में कामयाब रहे।
अलवर जिले में निकाय चुनाव alwar nikay chunav news का इतिहास पुराना है। वर्ष 1948 में अलवर नगर परिषद में पहला चेयरमैन चुना गया। इससे पूर्व नगर परिषद अलवर में सरकारी अधिकारी ही चेयरमैन मनोनीत होते रहे। तभी से लेकर अब तक अलवर नगर परिषद और जिले की अन्य नगर परिषद व नगर पालिकाओं के चेयरमैन निकाय की राजनीति से आगे नहीं बढ़ सके। हालांकि अलवर व भिवाड़ी नगर परिषद के सभापति रहे चुके कुछ नेताओं ने विधानसभा की चौखट तक पहुंचने के लिए दलीय व निर्दलीय तौर पर विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। इन नेताओं में नगर परिषद सभापति अजय अग्रवाल, भिवाड़ी नगर परिषद सभापति संदीप दायमा आदि शामिल हैं। सभापित ही नहीं कोई पार्षद भी विधानसभा में प्रवेश कर पाने में सफल नहीं हो पाया।
alwar nikay chunav newsविधायक रहते पार्षद का चुनाव लड़ा, हार मिली
अलवर की राजनीति के जानकार एडवोकेट हरिशंकर गोयल बताते हैं कि निकाय की राजनीति से कोई नेता विधायक तक छलांग लगा पाने में कामयाब नहीं हो सका, बल्कि विधायक चुने जाने के बाद नगर परिषद व नगर पालिका चेयरमैन बनने के लिए दो नेता भी पार्षद का चुनाव हार गए। राजगढ़ से वर्ष 1952 में विधायक बने पं. भवानी सहाय शर्मा नगर पालिका राजगढ़ का चेयरमैन बनने के लिए वर्ष 1953 में राजगढ़ में पार्षद का चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। इसी तरह बानसूर विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 1952 में विधायक बने बद्रीप्रसाद गुप्ता ने अलवर नगर परिषद चेयरमैन बनने के लिए वर्ष 1953 में अलवर में पार्षद का चुनाव लड़ा, लेकिन वे भी हार गए। वर्ष 1948 में अलवर नगर परिषद के चेयरमैन रहे लाला काशीराम जरूर सांसद बन पाने में कामयाब रहे।
alwar nikay chunav news छात्रसंघ चुनाव जीतकर कई नेता पहुंचे विधानसभा तक
निकाय चुनाव राजनीति तो नेताओं को विधानसभा की दहलीज तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हो सकी, लेकिन छात्रसंघ चुनाव से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले कई युवा जरूर विधायक का चुनाव जीतने में सफल रहे। इनमें कुछ नेता तो मंत्री तक बन पाए।
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