-स्पीकर का चुनाव ही तय कर देगा बहुमत
-बहुमत नहीं हुआ तो फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे देंगे फडणवीस
-प्लान-बी भी सोचकर ही इस दिशा में आगे बढ़ा है भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व
जयपुर/मुंबई/नई दिल्ली। महाराष्ट्र(Maharashtra) में जारी सियासी घटनाक्रम(Political Happening) के बीच मंगलवार सुबह सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) का फैसला जहां वहां की सरकार का भविष्य तय करेगा, वहीं विधानसभा में अध्यक्ष(Speaker) का चुनाव(Election) की सरकार के बहुमत को साबित(Prove Majority) कर देगा। दरअसल नियम यही कहता है कि नई विधानसभा के गठन के बाद पहले सत्र में विधायकों को शपथ दिलाने के लिए प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया जाता है। इसके तुरंत बाद स्पीकर का चुनाव होता है। ऐसे में स्पीकर का चुनाव ही सरकार के बहुमत को साफ कर देगा। यानी स्पीकर चुनाव ही बहुमत का लिटमस टेस्ट साबित होगा।
-उपहास का पात्र नहीं बनना नहीं चाहेंगे फडणवीस-बीजेपी
जानकारों की मानें तो सुप्रीम कोर्ट की ओर से अगर जल्द ही बहुमत साबित करने का आदेश दिया जाता है तो बीजेपी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस विधायकों का गणित देखेंगे और अगर उन्हें जरा भी संशय हुआ तो बहुमत साबित करने की नौबत से पहले ही फडणवीस संभवत: मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा सौंप देंगे। इसमें भी कोई शक नहीं होना चाहिए कि बिना बहुमत सदन में जाकर उपहास का पात्र न फडणवीस बनना चाहेंगे और न ही बीजेपी।
-समय सीमा का गणित
ये भी तय है कि राज्यपाल ने बीजेपी-अजित पवार को 30 नवंबर तक बहुमत साबित करने को कहा है। अपने विधायकों को बचाए रखने के लिए जल्द ही बहुमत साबित किए जाने के आग्रह के साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, शिवसेना और कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।
-आखिर चाणक्य 'शाह' का प्लान-बी क्या है?
राजनीति के जानकार ये भी मानते हैं कि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन हटवाकर फडणवीस के साथ अजित पवार को क्रमश: सीएम और डिप्टी सीएम की शपथ दिलवाने के बाद की रणनीति भी कुछ न कुछ तय कर रखी होगी। जिसमें कई विकल्प हो सकते हैं। कर्नाटक इसका एक उदाहरण है। ये तो भविष्य के गर्भ में है कि महाराष्ट्र की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी, लेकिन महाराष्ट्र में फिर से चुनाव कराने की योजना भी हो सकती है। भतीजे अजित पवार का चाचा शरद पवार से बगावत ही यह साबित करती है कि प्लान बी पर भी कोई रणनीति पहले ही तय हो चुकी है। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि शरद पवार २०२२ में देश के अगले राष्ट्रपति हो सकते हैं।
-क्षेत्रीय क्षत्रप खत्म करने की नीति भी...
इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज महाराष्ट्र में बीजेपी नंबर वन प्लेयर बन चुकी है। ऐसे में बीजेपी ने शिवसेना के साथ 50-50 फॉर्मूले को सिरे से खारिज कर दिया और अपनी रणनीति पर आगे बढ़ी। शिवसेना को कमजोर करने के लिए इससे बेहतर मौका नहीं हो सकता था। लोकसभा में बंपर बहुमत लेने के बाद देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का महत्व कम करना भी बीजेपी की अगली रणनीति हो सकती है। इसके अलावा विपक्षी दलों की विचारधारा पर भी यह एक अप्रत्यक्ष आक्रमण हो सकता है। राकांपा और कांग्रेस का हिंदुवादी शिवसेना के साथ जाना इस बात को प्रमाणित करता है। इन दलों की कॉमन मिनिमम कार्यक्रम पर सहमत होना भी इन सभी पार्टियों के लिए टेढ़ी खीर होगा। भाजपा सत्ता के लिए यदि आज आलोचना का शिकार हो रही है तो आने वाले समय में ये सभी दल भी सत्तालोलुपता के लिए बेनकाब होंगे।





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