अलवर. जिले के तीन शहरी सरकार के मुखिया का चुनाव कांग्रेस व भाजपा की प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता, इसलिए निकाय प्रमुख का चुनाव उसकी प्रतिष्ठा जुड़ा है, वहीं भाजपा को शहरी क्षेत्रों में अपना दबदबा कायम रखने के लिए चुनाव में जीत जरूरी हो गई है। वैसे तो तीनों ही निकाय दोनों दलों के लिए जरूरी हैं, लेकिन कांग्रेस व भाजपा की प्रतिष्ठा अलवर नगर परिषद सभापति के चुनाव से ज्यादा जुड़ी है।
शहरी सरकार के मुखिया के चुनाव की तस्वीर शनिवार को नाम वापसी के बाद स्पष्ट हो पाएगी, लेकिन इतना तय है कि जिले के तीनों निकायों में से दो पर कांग्रेस व भाजपा का सीधा तो थानागाजी में त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार हैं। दोनों ही दलों ने अपने-अपने बोर्ड बनाने को लेकर प्रयास तेज कर दिए हैं।
कांग्रेस को साख बचाने की चिंता
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए शहरी सरकार के मुखिया के चुनाव कांग्रेस की प्रतिष्ठा से ज्यादा जुड़े हैं। वहीं पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह व राज्य सरकार में स्वतंत्र प्रभार के श्रम राज्य मंत्री टीकाराम जूली के साथ तीन निकायों में दो निकायों के विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस व कांग्रेस समर्थित निर्दलीय विधायक होने से अलवर, भिवाड़ी व थानागाजी में बोर्ड गठन कांग्रेस की साख से जुड़ा है। इसके अलावा जिले के ११ विधानसभा क्षेत्रों में से ९ पर वर्तमान में कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित विधायक हैं। इस कारण भी कांग्रेस को शहरी सरकार में वर्चस्व जरूरी है।
भाजपा को शहरी क्षेत्रों में वर्चस्व के लिए जरूरी
शहर की सरकार के चुनाव भाजपा की प्रतिष्ठा से भी जुड़े हैं। कारण है कि भाजपा को शहरों की पार्टी माना जाता है और निकाय चुनाव शहरों में राजनीतिक वजूद दिखाने का बड़ा आइना है। वैसे भी अलवर शहर में वर्तमान में भाजपा के विधायक हैं। वहीं अलवर शहर विधानसभा क्षेत्र पर एक दशक से ज्यादा समय से भाजपा का कब्जा है। इस कारण भी अलवर नगर परिषद के सभापति का चुनाव भाजपा की प्रतिष्ठा से जुड़ा है। वहीं भिवाड़ी में पिछली दो बार से भाजपा का बोर्ड रहा है। इस कारण तीसरी बार सभापति का चुनाव भाजपा की साख से जुड़ा है। थानागाजी में पहली बार नगर पालिका के चुनाव हो रहे हैं, इस कारण भाजपा यहां अपना खाता खोलना चाहती है।
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