उदयपुर/ मेनार. BAT पेड़ पर उल्टे लटके चमगादड़ को देखने में अजीब से लगते हैं। ऐसे रवैये को लेकर लोगों में बड़ी उत्सुकता रहती है कि आखिर क्यों ये उल्टे लटकते हैं? क्यों ये रात में ही अपने ठिकानों से बाहर निकलते है? ऐसी उत्सुकताओं से भरे माहौल में बर्ड विलेज मेनार में चमगादड़ आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। कस्बे के ब्रह्मसागर तालाब किनारे पाल पर सैकड़ों आमों की वृक्षावली है, जिन पर हजारों चमगादड़ों का बसेरा है। चमगादड़ को स्थानीय भाषा में वागळ भी कहते हैं। यहां बसे फल खाने वाले चमगादड़ अच्छे स्थान पर बैठने के लिए आपस में प्रतियोगितात्मक लड़ाई करने के दौरान कर्कश आवाज निकालते हैं। इनकी आवाज शाम के भोजन करते समय लोग घरों तक सुनते हैं। चमगादड़ आकाश में उडऩे वाले विशिष्ठ बनावट वाले स्तनधारी प्राणी हैं, जो निशाचर होता है। सघन छांव वाले पेड़ों की डाली अथवा अंधेरी गुफाओं के अन्दर उल्टा लटके रहते हैं।
सूरज ढलते ही तालाब पर मण्डराते हैं
ये उच्च विकसित स्तनधारी प्राणी हैं, जो सूरज ढलते ही पानी पीने के लिए तालाब के इर्द-गिर्द मंडराने लगते हैं। शाम के समय का नजारा दिलकश होता है। सूर्यास्त के समय का नजारा मोहक होता है। तालाब के आम के पेड़ों पर सैकड़ों वर्षों से इनकी सत्ता कायम है। मेनार में तालाब किनारे पेड़ों पर पाए जाने वाले इनके कुछ नजदीकी रिश्तेदार चमगादड़, जो कीड़े-मकोड़े खाने वाले मांसाहारी होते हैं, रात्रि में शिकार के लिए निकल पड़ते हंै।
शाकाहारी और मांसाहारी
चमगादड़ दो तरह के होते हैं। एक शाकाहारी जो फल-फूल खाते हैं, जो अधिकांशत: पेड़ों पर रहते, लेकिन इनकी कुछ जातियां अंधेरी गुफाओं में भी होती हैं। ये आकार में थोड़े बड़े होते हैं, जिन्हें फ्रुट इटिंग बैट कहा जाता है, जबकि दूसरे मांसाहारी चमगादड़ जो कीटभक्षी होते, ये घरों, पुराने खंडहरों, गुफाओं आदि में रहते हैं। शाकाहारी चमगादड़ गन्ध सूंघकर अपना भोजन ढूंढते हैं, जिनमें इनकी आंखें भी मदद करती हैं, जबकि दूसरा मांसाहारी जिनके नाक-कान पर विचित्र जैविक रडार प्रणाली होती, वे प्रतिध्वनि से स्थिति निर्धारण विधि से अपना भोजन तलाशते हैं। ये स्तनधारी होते हैं। चमगादड़ अंडे नहीं, बल्कि विकसित नन्हें बच्चे को जन्म देते हंै। माताएं इनको दूध पिलाती हैं। इनके मुंह-नाक-कान चूहे से काफी मिलते-जुलते हैं।
हवा में उड़ते हुए लेता है पानी-भोजन
चमगादड़ की शारीरिक बनावट विशिष्ट होती है, जो अन्य पक्षियों से मेल खाते हुए भी भिन्न होती है। इनके पैर और हाथ पंख की झिल्लीनुमा पंख में समाहित होते हैं। अत: वे स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाते हैं, इसलिए एक बार अगर जमीन पर उतर जाए तो फिर इनके पुन: उड़ान भरने की संभावनाए न के बराबर रह जाती है। कंधे से लेकर अंगुलियों के छोर तक की हड्डियां पंख को सहारा देती, जो उडऩे में भूमिका निभाती है।
रडार प्रणाली से रात्रि में करता है शिकार
कीटभक्षी चमगादड़ रात्रि में शिकार करते हैं। इनके नाक-कान पर रडार की तरह काम करने वाली जैविक तंत्र की रचनाएं प्रकृति ने प्रदान की है। इस विशिष्ठ रडार से जब ये हवा में उड़ान भर रहे होते हैं, तो विशिष्ट तरंगों का प्रसारण करते हैं, जो हवा में फैलती तरंगें अंधेरे में उड़ते छोटे-मोटे कीटों से टकराकर वापस लौटती हैं। इनके खास कान उन्हें आसानी से सुन लेते हैं। रात्रि में भी गतिमान कीटों की दूरी एवं दिशा का सटीक आकलन कर उस दिशा में बढ़कर सीधे ही मुंह खोल किट को पकड़ लेते हैं। इनके मुंह में पूर्ण विकसित दांत एवं दाढ़ होती है, जो कीटों को पीस देते हैं। फिर निगल जाते है। bat इस खास प्रणाली के कारण ही ये रात में बिना टकराए उड़ते हैं। भारत में 114 प्रजातियों के चमगादड़ पाए जाते हैं, जिनमें से 14 शाकाहारी होते हैं।डॉ. सतीश शर्मा, वन्यजीव विशेषज्ञ, उदयपुर





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