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Mumbai Attack : 26/11 हमले की गवाह देविका का कहना : हाफिज सईद को फांसी होने पर मिलेगा इंसाफ

पाली। 29/11 Mumbai Attack : मुम्बई में आज से 11 वर्ष पहले वर्ष 2008 में 26/11 का आतंकी हमला [ Terrorist Attack ] हुआ। इस हमले के आतंकी अजमल कसाब [ terrorist Ajmal Kasab ] को न्यायालय में पहचानकर फांसी के फंदे तक ले जाने वाली मूल रूप से पाली के सुमेरपुर की बेटी देविका रोटावन [ Devika Rotavan ] थी, जो उस दिन पिता के साथ छात्रपति शिवाजी टर्मिनल [ Chhatrapati Shivaji Terminus ] रेलवे स्टेशन पर पूना जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रही थी। हमले के समय वह वह महज 9 साल 11 माह की थी, लेकिन उसके जहन में आज भी वह आतंकी मंजर वैसा ही ताज है जैसा उस समय था। वह कहती है उसे पूरा इंसाफ तो तभी मिलेगा, जब हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद [ terrorist hafiz saeed ] को फांसी की सजा होगी। उसकी गवाही से जिस अजमल कसाब को फांसी की सजा हुई, वह तो एक प्यादा था। असल में मास्टर माइंड को सजा होने पर ही वह आज तक झेल रही दुख को कुछ भूल सकती है।

परिवार की जिंदगी ही बदल गई
देविका बताती है कि आतंकी अजमल कसाब को पहचानने व गवाही देने के बाद से उसके परिवार की जिंदगी ही बदल गई। लोगों ने उनसे बात करना बंद कर दिया। आज भी हालात ऐसे है कि सुमेरपुर जाने पर रिश्तेदार उनको घर में ठहराने को तैयार नहीं होते है। वे कहते हैं उनको साथ रखने पर उनके परिवार को खतरा होगा। हद तो यह है कि पूना में रहने वाले बड़े भाई भरत कुमार ने शादी तक खुद को अकेला बता कर ली। पिता आज जब बेटे जयेश रोटावन के लिए रिश्ता मांगने जाते हैं तो लोग इनकार कर देते हैं।

आर्थिक रूप से टूट गया घर
देविका का परिवार आज भी मुम्बई में एक किराए के घर में रहता है। हमले से पहले पिता नटवरलाल रोटावन ड्राई फूड का बिजनेस करते थे, जो अच्छा चलता था, लेकिन हमले के बाद व्यापारियों ने उनसे यह कहकर सामान लेना व बेचना बंद कर दिया कि ऐसा करने पर उनकी जिंदगी संकट में आ जाएगी। वह बताती है आर्थिक मदद व पढऩे में सहायता के लिए पीएम से लेकर सीएम तक गुहार लगाई। इसके बावजूद आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला है। जो थोड़ी मदद मिली वह भी सालों तक सीएम और अन्य सरकारी विभागों के चक्कर लगाने के बाद।

भाई हो गया संक्रमण का शिकार
देविका बताती है कि हमले में उसने कसाब को देख लिया था। उसके बाद उसके पैर में गोली लगने से वह बेहोश हो गई। स्टेशन पर प्रसाधन के लिए गया भाई जयेश भी तीन घंटे बाद अस्पताल में मिला। उसने मेरे साथ वहां भर्ती घायलों व अन्य लोगों की ड्रेसिंग करने के साथ कई तरह से सहायता की। इसका परिणाम यह हुआ कि वह संक्रमण का शिकार हो गया और आज वह 24 वर्ष का होने पर भी छोटा दिखता है। उसके साथ कोई अपनी बेटी का विवाह तक नहीं करना चाहता है। लोग आज भी आतंकी हमले से डरते हैं।

घर का बेच दिया सामान
26/11 की दास्तां बताते हुए देविका कहती है मुझे गोली लगने के बाद पहले सेंट जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया। वहां से जेजे अस्पताल ले गए। जहां मैं, पापा और भाई डेढ़ माह तक रहे। इस बीच जिस घर में हम किराए रहते थे, उन्होंने सोचा हम हमले में मारे गए और हमारा सारा सामान बेच दिया। जब अस्पताल से मैं बैसाखी के सहारे घर पहुंची तो सामान बेचने की बात सामने आई। इसके बाद बड़ी मुश्किल से आज तक हम घर चला रहे हैं।



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