उदयपुर/ फलासिया. Historical places वेद, पुराणों और सनातन धर्मी मान्यता के अनुसार जीवन पर्यंत साढ़े 12 ज्योर्तिलिंगों के दर्शनों का विशेष महत्व है, लेकिन आपको ये जानकार अचरच होगा कि फलासिया पंचायत समिति मुख्यालय से महज दो किलोमीटर दूरी पर स्थित बिछीवाड़ा गांव में रियासतकालीन 52 शिवलिंग स्थापित हैं। ऐतिहासिक धरोहरों के नाम पर इन शिवलिंगों और 11 सौ वर्ष पुराने मंदिरों को आंचल में समाए इस गांव को लेकर इतिहास में कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि रियासत काल में बिछीवाड़ा समीपवर्ती फलासिया से बड़ा गांव हुआ करता था। यहां जागीरदार से लेकर राजा की हवेली हुआ करती थी। लेकिन, तत्कालीन परिस्थितियों के अज्ञात कारणों के बीच रियासतकालीन परिवार गांव छोड़कर अन्यत्र स्थानांतरित हो गए। जागीरी से जुड़े सभी अवशेष समय के साथ लुप्त हो गए, लेकिन गांव के चारों ओर स्थापित करीब 56 मंदिर आज भी इस गांव के 'देवनगरीÓ होने के प्रमाण देते हैं। ऐसा अनुमान भी लगाया जाता है कि तत्कालीन जागीरी के सरदार शिव भक्त हुआ करते थे, जिनकी भगवान शिव की भक्ति के बीच पूरे गांव को धार्मिक सुरक्षा देने के लिए यहां शिवलिंग स्थापित किए गए थे। हालांकि, यह पहेली अब भी उलझी हुई है। गांव में दो ही पुराने बुजुर्ग हैं, जो इन मंदिरों से जुड़ी किवदंतियों को बयां करते हैं।
11सौ वर्ष पुराना है गोविन्द श्याम मंदिर
बिछीवाड़ा गांव के मध्य में भगवान गोविन्द श्याम का करीब 11 सौ वर्ष पुराना एक ऐतिहासिक मंदिर है। पुराने लोगों की जुबानी के अनुसार मारवाड़ ़के दरबार जब द्वारिकाधीश के दर्शन को जा रहे थे। तब पूरे लवाजमे के साथ उन्होंने कुछ दिन बिछीवाड़ा गांव में विश्राम किया था। तब उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से यहां पर भगवान कृष्ण का मंदिर की स्थापना की। उसके बाद वह फिर से मारवाड़ चले गए। इस दौरान ही उन्होंने उनकी बहन सुंदर बाई के नाम पर बावड़ी व बगीचे का निर्माण कराया था। गांव में 15 सौ वर्ष पुराना जैन मंदिर भी है। इसमें भगवान पाश्र्वनाथ, आदिनाथ, मल्लीनाथ की अतिप्राचीन मूर्तियां हैं।
एक हजार साल पुराना अखर श्याम मंदिर
किवदंतियां हैं कि रियासत काल में फलासिया से पहले बिछीवाड़ा बड़ा गांव था। राजघराना भी इसी गांव में बसता था। इस कारण यहां के राज दरबार देवीसिंह ने राज मंदिर बनवाया, जिसका नाम अखर श्यामजी रखा गया। इस मंदिर में भी करीब 1000 वर्ष से ज्यादा पुरानी भगवान कृष्ण की मूर्ति स्थापित की गई।
गांव के चारों ओर 6 फीट लंबे शिवलिंग!
बिछीवाड़ा गांव के चारों ओर स्थापित 52 शिवलिंगों की विशेषता यह है कि ये शिवलिंग करीब पांच से छह फीट लंबे हैं। कुंभलगढ़ में ऐसा ही एक शिवलिंग करीब 7 फीट लंबा है। ऐसे में मान्यता है कि रियासत परिवार के लोगों की उस समय लंबाई अधिक होती होगी, जो बैठकर इतने ऊंचे शिवलिंग की पूजा किया करते होंगे। ग्रामीणों के अनुसार इन शिवलिंगों की आयु भी 11 सौ वर्ष से अधिक है। दंतकथा है कि बिछीवाड़ा गांव का पुराना नाम विजयपुर पाटन भी था। ये गांव झाड़ोल उपखण्ड का सबसे बड़ा गांव हुआ करता था। वर्षों पहले प्राकृतिक कारणों से पूरे गांव का अस्तित्व खत्म सा हो गया। इसके बाद लोग कुछ दूरी पर बिछीवाड़ा के नाम से बस गए। पुराने लोगों की मानें तो रियासतकाल में इन 52 मंदिरों में एक साथ शिवलिंग की पूजा होती थी और झालर बजती थी, जो दूर-दूर तक गांवों में सुनाई देती थी।
ऐतिहासिक हैं मंदिर
पहले झाड़ोल की जगह बिछीवाड़ा राजघराना था। वहां आज भी राजमंदिर है। हमारा परिवार भी कभी कभार वहां पूजा करने जाता है। वहां जाने मात्र से गांव के देवनगरी होने के प्रमाण झलकते हैं।
विश्वविजय सिंह झाला, पूर्व राज परिवार से
90 फीसदी मंदिर
पूर्व राज परिवारों में शासन क्षमता के अलावा धर्म के प्रति भी प्रगाढ़ श्रद्धा थी। बिछीवाड़ा ही नहीं पूरे झाड़ोल में करीब 90 फीसदी मंदिरों का निर्माण रियासतकाल में हुआ है। संरक्षण के अभाव में कुछ मंदिरों का इतिहास खत्म हो रहा है।
नीलमराज पुरोहित, राजपुरोहित ठिकाना झाड़ोल
होना चाहिए इतिहास
बिछीवाड़ा के इतिहास को मेवाड़ के इतिहास में जगह मिलनी चाहिए। दंत कथाओं से जुड़े कई प्रमाण यहां मिल सकते हैं। सरकार स्तर पर इस ओर ध्यान देना चाहिए। अन्यथा ऐसे रोचक इतिहास भविष्य में इतिहास तक ही सीमित हो जाएंगे।
देवेंद्र औदिच्य, अध्यापक, बिछीवाड़ा





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