उदयपुर/ झाड़ोल. agriculture news औषधीय गुणों वाली फसलों की पैदावार को लेकर जिले में विशेष पहचान रखने वाले झाड़ोल में कांगनी और गन्ना जैसी खेती को लेकर किसानों में उत्साह कम होता जा रहा है। यूं समझें कि स्थानीय लोगों का परंपरागत खेती से मोह कम हो रहा है। कुल मिलाकर क्षेत्र में देशी फसलों की पैदावार में निरंतर कमी आ रही है। कुछ विशेष प्रकार के अनाज भी खोजने से नहीं मिल रहे। नई पीढ़ी के किसान तो बहुत सी फसलों के नाम तक भूल गए हैं। पहले कभी क्षेत्र में बाजरा, कांगनी, चावल, उड़द, अरवी, रतालू, सूरण, हल्दी, अदरक, देशी अरहर के अलावा धान की कई फसलें क्षेत्र की विशेष पहचान कराती थी, लेकिन संकर प्रजाति की अधिक उपयोगिता से इन पैदावारों पर संकट मंडरा रहा है। पहले के किसान इन फसलों की पैदावार में उर्वरक का इस्तेमाल भी नहीं करते थे।
गन्ने की फसल भी लुप्त!
बात गन्ने की खेती की करें तो अब किसानों में इस खेती को लेकर भी मोह नहीं बचा है। पहले कभी अच्छी बरसात के दौरान क्षेत्र में गन्ने की पैदावार अधिकता पर हुआ करती थी। बीते कुछ सालों से वातावरण में आए बदलाव एवं कम बरसात के बीच किसान परिवारों का गन्ने की खेती से दूरी बनाने का क्रम निरंतर जारी है। क्षेत्र में गन्ने की अधिकता के बीच गुण बनाने की भी परंपरा थी, जो कि अब कभी कभार ही खेतों में देखने को मिलती है।
फायदे का सौदा
कांगनी फसल मात्र ढाई से तीन माह में पककर तैयार हो जाती थी। इसके बाजार भाव भी अच्छे मिलते थे। agriculture news क्षेत्रीय किसानों ने कई तरह की पारंपरिक फसलों से दूरियां बना ली है।
गौरीशंकर जोशी, कृषि अधिकारी, झाड़ोल





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