जयपुर। जयपुर शहर की बसावट के ब्लू प्रिंट को लागू करने में फेल नौकरशाह अब कंक्रीट का जंगल बसाने पर उतारू हैं। कमाई के लालच में आबादी क्षेत्र से दूर नई आवासीय योजनाएं बसाई जा रही है। इसके लिए नौकरशाह किसान—काश्तकारों तक की जमीन लेने पर उतारू हैं और हरियाली खत्म की जा रही है। गंभीर यह है कि खुद जेडीए अब तक 41 से ज्यादा आवासीय योजना लांच कर चुका है लेकिन आबादी इलाके से कई किलोमीटर दूर होने के कारण बदहाल पड़ी है। केवल कमाई के फेर में हरियाली को दफन कर कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दिया गया। ऐसे ही हालात सीकर रोड पर पनपाए जा रहे हैं। यहां नींदड़ आवासीय योजना के नाम पर एक बार फिर योजना लांचिंग की तैयारी है। इसके लिए काश्तकारों की जमीन जबरन ली जा रही है। नौकरशाहों की मनमानी के आगे हुक्मरान भी खामोश हैं। हालात ऐसे हो गए कि प्रभावित किसान-काश्तकारों को अपेक्षित मुआवजा लेने और जमीन बचाने के लिए दोबारा जमीन समाधि सत्याग्रह शुरू करना पड़ा है। कड़ाके की ठंड के बीच लोग शरीर के आधे हिस्से को जमीन के नीचे दबाकर विरोध जता रहे हैं लेकिन सरकारी मुलाजिमों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। आपको बता दें कि जेडीए यहां योजना लांच कर तिजोरी में 1 हजार करोड़ से ज्यादा रोकड़ जुटाना चाह रहा है। आर्थिक तंगी से निकलने का दूसरा रास्ता नहीं खोजा ही नहीं जा रहा। न ही सरकार का इस तरफ फोकस है।
दोनों ही सरकार में सुनवाई नहीं
पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में दो साल पहले यहीं आंदोलन किया था जो 44 दिन चला। मौजूदा कांग्रेस सरकार में किसान-काश्तकारों को दबाने का काम हो रहा है। लगातार नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा देने की मांग की जा रही है। अब प्रभावितों ने दो टूक कह दिया है कि अब आंदोलन उसी समय खत्म होगा, जब किसान-काश्तकारों की मांग ली जाती है।
आवासीय योजनाओं की बदहाली
-जेडीए की आवासीय योजना आबादी क्षेत्र से 22 से 45 किलोमीटर दूर है। ज्यादातर जगह न तो पहुंचने की सुविधा है और न ही एप्रोच रोड। योजनाओं में एक भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है, जो रहने के लिए जरूरी है।
-बिजली के पोल जरूर नजर आते हैं, लेकिन विद्युत सप्लाई ही नहीं है। पेयजल का अता-पता नहीं है और न ही शिक्षा-चिकित्सा की सुविधा। आखिर, जनता रहे तो कैसे। लेकिन तिजोरी भरने में व्यस्त अफसरों को उनकी परवाह ही नहीं है।
-सृजित योजनाओं में भूखण्ड की लाइनिंग ही नहीं। किस आवंटी का भूखण्ड कहां है, यह ही पता नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में निर्माण कहां करें।
-कई योजनाओं में मिट्टी के बड़े-बड़े टीले लगे हुए हैंं। लेवलिंग ही नहीं।
-पेयजल के लिए टंकी बनी हुई है, लेकिन पेयजल लाइन ही नहीं।
-सामुदायिक केन्द्र बनाकर छोड़ दिया पर उसकी सार-संभाल तक नहीं। खंडहर में हो रहे हैं तब्दील।
-सीवरेज सिस्टम शुरू नहीं। जबकि, ड्रेनेज तक को बिछाया ही नहीं। इससे पानी की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं।
-योजना तक पहुंचने के लिए किसी तरह का परिवहन का साधन नहीं। सड़क और रास्ता भी बदहाल।
-कई योजनाओं में अब भी भूमि मालिकाना हक का विवाद। जबकि, जेडीए आवंटन कर चुका है लेकिन खातेदार रास्ता ही नहीं दे रहे।
-कई जगह अतिक्रमियों की भरमार।
-योजनाओं से बिजली, पानी के संसाधन चोरी हो गए।





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