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यहां 100 साल पहले जैन मंदिर में की थी मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा

बुरहानपुर. श्री जैन श्वेतांबर शांतिनाथ मंदिर में मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के 100 वर्ष पूर्ण होने पर शताब्दी महोत्सव का आयोजन बुधवार से शुरू हो रहा है। इसके लिए भव्य तैयार की गई है। इस महोत्सव के लिए 700 किमी पैदल यात्रा कर जैन मुनि भी आ चुके हैं, जिनके रोज प्रवचन चल रहे हैं। तिलक चौराहा स्थित जैन मंदिर पर आकर्ष रंगरोगन कर विद्युत सज्जा की गई है।

मंदिर ट्रस्टी मेहूल जैन ने बताया कि श्री जैन श्वेतांबर शांतिनाथ मंदिर को 100 साल पूर्ण होने पर महोत्सव मनाया जाएगा। 26 से 6 मर्च तक विभिन्न कार्यक्रम होंगे। इस कार्य के लिए जैन समाज के आचार्य भगवंत राजचंद्र सुरीश्वर महाराज साहेब पालीताणा गुजरात से 700 किलोमीटर पैदल विहार कर बुरहानपुर पधार चुके हैं। विभिन्न प्रकार के पूजन एवं रोज विशेष प्रकार की सजावट के साथ मंदिर में आरती गीत संगीत भजन गीत का कार्यक्रम रहेगा। 4 मार्च को भव्य रथ यात्रा जैन मंदिर तिलक चौराहा से निकलेगी जो शहर के विभिन्न मुख्य मार्गों से भ्रमण कर श्रीजी, भगवान के दर्शन करवाएगी। श्रीजी चांदी के रथ में विराजमान होंगे। बड़ी संख्या में भक्तजन आएंगे और इसका लाभ लेंगे। 5 मार्च को ध्वजारोहण किया जाएगा।

ऐसा है मंदिर का इतिहास
ट्रस्टी मेहूल जैन ने बताया कि जैन मंदिर का इतिहास 1200 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। इसका उल्लेख स्कंद पुराण में में मिलता है। मुगल शसन काल में अनेक बादशाह, राजा, महाराजा इस नगर में शासन कर चुके हैं। जैसी की सम्राट अकबर, औरंगजेब, शिवाजी महाराज, फारुकी वंश का 700 वर्ष शासन रहा है। यहां अनेक ऐतिहासिक इमारते जीर्ण अवस्था में आज भी उनके अतित का गौरवशाली बखान कर रही है। शहर में जैन समाज का भी गौरव पूर्ण इतिहास रहा है। वर्तमान में श्वेतांबर और दिगंबर मंदिर में 400 से 1200 वर्ष पुरातन प्रतिमा विराजमान है। प्रतिमाओं की पुरातनता एवं भवय्ता देख्खते ही बनती है। लगभग 200 वर्ष पूर्व यहां श्वेतांबर जैन के हजारों घर एवं हजारों की संख्या में बस्ती थी। उस समय यहां पर अनेक जैन मंदिर व सैकड़ों प्रतिमा विराजित थीं । इस बात का प्रमाणित उल्लेख जब से मिलता है तब यहां श्वेतांबर जैनों के 18 भव्य जैन मंदिर कास्ट की अधिकता थी। इनमें सैकड़ों छोटी बड़ी प्रतिमाएं स्थापित थीं। कालांतर में जैनों की संख्या तात्कालीक कारणों से कम होती गई एवं संवत 1900 नगर में भयंकर अग्निकांड हुआ उसमें अधिकांश मंदिर पूर्णत: जल गए एवं कुछ अत्यंत क्षतिग्रस्त हो गए। उस के बाद संवत 1956 के लगभग यहां नौ जिन मंदिर के प्रमाण है। श्री विजय लक्ष्मीसूरीजी के स्नवन में यहां स्थित नौ जिन मंदिरों का उल्लेख है। कालांतर में जैनों की बसाहट बहुत ही कम हो गई तथा मंदिरों के रखरखाव बगैर कार्यों में क्षीणता शिथिलता आ गई। इस कारण यहां के श्री संघ ने मंदिरों की संख्या कम करने का निर्णय लिया एवं यहां की जिन प्रतिमाजी विभिन्न स्थानों पर भेजी गई। (जैसे पालीताणा, मंबई, नेर, भांडक, कच्छ आदि है।) 9 भव्य जिन मंदिरों के मूलनायकजी की प्रतिमाएं वर्तमान में स्थित एक जिन मंदिर में प्रतिष्ठित है। सभी प्रतिमाएं भव्य चमत्कारीक एवं मनोहरणी है।



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