बुरहानपुर. स्वास्थ्य मंत्री तुलसीराम सिलावट के प्रभार वाले जिले में स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल है। जिला अस्पताल में आईसीयू, एमआरआई जांच तो दूर सामान्य सोनोग्राफी तक नहीं हो पा रही है। गरीबों को बाहर महंगे दामों पर सोनोग्राफी जांच कराना पड़ रही है। यहां तक निजी सेंटरों पर भी कोई शिकंजा नहीं है। 700 से 1500 रुपए तक सोनोग्राफी और मनमाने रेट पर एमआरआई जांच हो रही है। सारी समस्याओं पर स्वास्थ्य मंत्री से केवल आश्वासन मिला है।
15 साल भाजपा सरकार रहने के बाद जब कांग्रेस सरकार आई तो स्वास्थ्य मंत्री तुलसीराम सिलावट को बुरहानपुर का प्रभारी बनाने पर स्वास्थ्य क्षेत्र में कई बदलाव की उम्मीद जगी, लेकिन एक साल बाद भी उम्मीदे धराशायी हो गई। संसाधन तो दूर इनके विशेषज्ञों की भर्ती तक नहीं हो सकी। यह हाल जिला अस्पताल का हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।
प्रसूताओं की सबसे अधिक परेशानी
जिला अस्पताल में प्रसूताओं की सबसे अधिक परेशानी है। यहां रुटीन जांच में जब चिकित्सक सोनोग्राफी जांच की बात करती हैं, तो इसके लिए बाहर निजी सेंटर पर जाना पड़ता है। एक जांच 700 रुपए तक होती है, जबकि कलर डॉपलर 1500 रुपए तक हो पाती है। एक बार की जांच में 700 रुपए ढिले करने पर भारी आर्थिक भार पड़ता है। विभाग ने न तो जिला अस्पताल में सोनोग्राफी की व्यवस्था की न बाहर निजी सेंटरों पर कोई शिकंजा कसा है। यह मनमाने दाम केवल सोनोग्राफी जांच तक सीमित नहीं है। एमआरआई और सामान्य लेब की जांच में भी अधिक रुपए वसूले जा रहे हैं।
रेट सूची गायब
निजी सोनोग्राफी सेंटर, एमआरआई जांच सेंटर, लेबों पर अलग-अलग जांच के रेट सूची होना चाहिए। लेकिन सेंटरों पर किसी भी तरह की कोई सूची चस्पा नहीं की गई है। जब दाम सुनते हैं, तो मरीज के अटेंडर को पसीना आ जाता है। विभाग की ओर से सोनोग्राफी सेंटरों पर जांच तक नहीं की जाती।
27 करोड़ के अस्पताल में बेड तक नहीं
27 करोड़ के जिला अस्पताल में हालत इतनी दयनीय है कि यहां मरीजों को भर्ती करने के लिए बेड तक की व्यवस्था नहीं है। मरीजों को जमीन पर लेटाना पड़ता है। यहां की व्यवस्था पुराने अस्पताल की तरह बनी हुई है। पहले कईबार यहां पर इंदौर और भोपाल के अफसरों का दौरा लगता रहा, उन्हें भी यहां की समस्याएं अवगत कराई, लेकिन व्यवस्थाओं में कोई सुधार नहीं आया। जिला अस्पताल की सबसे बड़ी खामी सरकारी बजट में 200 बेड का होना है। जबकि अस्पताल में व्यवस्थाएं 300 बेड की है। लेकिन व्यवस्थाएं 200 बेड के हिसाब से चल रही है। इस चक्कर में सफाई का पर्याप्त स्टॉफ है न सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम। यहां तक इलाज के लिए चिकित्सक और संसाधन भी नहीं है।
यह है अस्पताल की स्थिति
जिला अस्पताल में 25 चिकित्सक काम कर रहे हैं, जबकि 44 पद खाली है। यही कारण है कि मरीजों की अस्पताल में भीड़ और समय पर इलाज न होना विवाद का आए दिन कारण बनता है। इसमें सबसे जरूरी गायनोक्लोजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट सहित कई विशेषज्ञों की आवश्यकता है। जिले के अलावा अन्य सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कुल 9 चिकित्सक पदस्थ है, जबकि 10 पद और खाली पड़े हैं।
- अस्पताल में आईसीयू नहीं है इसके लिए अलग से स्टॉफ और चिकित्सक लगते हैं, वह नहीं है। एमआरआई और ट्रामा सेंटर भी नहीं है। सोनोग्राफी हर दिन 25 से 30 मरीजों को जरूरत लगती है जांच के लिए, बाहर ही निजी सेंटर पर कराते हैं। पहले अनुबंध था। लेकिन फंड नहीं आया तो फिर अनुबंध खत्म हो गया। सारी समस्या हमने स्वास्थ्य मंत्री को बताई है, उन्होंने आश्वासन दिया है।
- डॉक्टर शकील अहमद खान, सिविल सर्जन





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