बुरहानपुर. कोरोना वायरस को लेकर जिला अस्पताल में लापरवाही बरती जा रही है। सर्दी, खांसी के मरीजों के लिए अलग से ओपीडी बनाकर जांच तो की जा रह है। लेकिन इनके लिए अलग से दवाई वितरण का काउंटर नहीं बना है। यह मरीज भी सामान्य मरीजों की कतार में खड़े होकर दवाईले रहे हैं। इसमें भी दिक्कत यह है कि एक की काउंटर से दवाईवितरण किया जा रहा है। जहां एक महिला और दूसरी पुरुष की लाइन है।
जिला अस्पताल में अव्यवस्थाएं समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है। नया भवन बनने के बाद ओपीडी में मरीजों की संया बढ़ गई। इस चक्कर में ६ माह में जहां पहले ५० लाख की दवाइयों की खपत होती थी, वह आंकड़ा ७० लाख पर पहुंच गया। लेकिन दवाई वितरण की व्यवस्था बदहाल है। यहां दवाई के लिए मरीजों को घंटों लाइन में लगने के बाद दवाई नसीब होती है।
दवाई का बोझ भी बढ़ा
शहर में बढ़ती बीमारियों के कारण दवाइयों के बजट पर भी बोझ बढ़ा है। २०१५ के बाद २५ फीसदी दवाइयों की खपत बढ़ी थी, जो ५ साल में बढ़कर अब ५० फीसदी तक हो गई। इसमें उल्टी-दस्त की बीमारी, शुगर, सर्दी, खांसी और बुखार के मरीज सबसे अधिक रहे, जिन पर १० लाख रुपए की दवाइयों का खर्च आ गया है। अब दवाइयां तो अस्पताल में उपलब्ध हो जा रही है, लेकिन इसके वितरण की व्यवस्था सही नहीं है।
यह होती है परेशानी
सुबह ८.३० से दोपहर १ और ३ से ४ बजे तक अस्पताल में इलाज का समय है। इसी समय में दवाइयां भी मिलती है। पहले मरीज को ओपीडी में चिठ्ठी बनाने के लिए लंबी कतार में लगना पड़ता है, इसमें एक घंटे का समय जाता है। फिर डॉक्टर के पास चेकअप के लिए कतार, यहां डॉक्टर ने किसी जांच एक्सरे लिख दिया तो उसमें भी लाइन। जांच कर लौटने के बाद बारी फिर दवाई की आती है, यहां पर फिर एक घंटा दवाई के लिए खड़े रहना पड़ता है। सोमवार से गुरुवार तक यहां भीड़ अधिक रहती है।
निजी के मरीज भी सरकारी के भरोसे
एक बार जब शुगर की बीमारी पता चली तो इसका जीवन भर दवाई खाने का टेंशन बढ़ जाता है। निजी में जांच चलने के बाद जब हर रोज दवाई का बोझ मरीज की जेब पर पड़ रहा हैं, तो वह नि:शुल्क दवाई के चक्कर में सीधे सरकारी अस्पताल की ओर रुख कर रहा है। पिछले तीन माह में ३० फीसदी मरीज शुगर के अधिक बढ़े हैं। सवा लाख रुपए की मेटफोरमिंग दवाई, इंसुलेन के इंजेक्शन पर ६० हजार और जिमि प्राइडल नाम की दवाई पर ८० हजार रुपए का खर्चा केवल शुगर बीमारी की दवाई पर आया है।
- एक दिन में एक हजार मरीजों की ओपीडी रहती है। सर्दी, खांसी के मरीज आते हैं तो उनके लिए अलग से ओपीडी है, यहां पता चल जाता है कि टीबी, अस्थमा है या सामान्य सर्दी खांसी। टीबी निकलती है तो अलग से दवाईकाउंटर है। लकिन अस्थमा या सामान्य सर्दी खांसी के लिए एक ही काउंटर है।
- डॉक्टर शकील अहमद खान, सिविल सर्जन





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