अश्वनी प्रतापसिंह
राजसमंद. कोरोना की वैष्विक महामारी से हुआ लॉकडाउन लोगों को परम्परागत जीवन शैली की ओर ले जा रहा है। यह बदलाव ग्रामीण परिवेश में ज्यादा देखने को मिल रहा है। यहां खाना से लेकर खेलने तक की पुरानी परम्पराएं इन दिनों जीवंत हो उठी हैं। गैस होते हुए भी घरों में चूल्हे में पकवान बन रहे हैं, लोगों का कहना है कि कुछ व्यंजन ऐसे होते हैं जो चूल्हे में अच्छे बनते हैं, अब सबके पास खूब समय है, इसलिए ऐसे व्यंजनों का भी आनंद ले लिया जाए।
इन खेलों का चलन बढ़ा
महाभारत के समय में जुएं के रूप में चौसर का खेल काफी प्रचलित था, इस खेल में ही कौरवों ने पांडवों से उनका राज आदि सब छीन लिया था। धीरे-धीरे चौसर के खेल को कई आंचलिक खेलों में बदल लिया गया और अंचल के हिसाब से इसके नामों में भी परिवर्तन हो गया। राजसमंद जिले में भी इस खेल के कई प्रतिरूप हो गए, नाहर कांकरी, चरभर, चंगा, सोलहसाड़ी, मनकिडियो, बिसयो आदि। इनमें खिलाडिय़ों की संख्या भी अलग-अलग होती है। हालांकि अब इसे जुएं के रूप में कम ही खेला जाता है, लोग शौकियाना तौर पर ही खेलते हैं। दौड़ भाग की जिंदगी में ग्रामीण अंचलों से भी ये खेल पिछले करीब दो दशक से लुप्त हो गए थे, बच्चे तो इनके नाम भी नहीं जानते, लेकिन अभी लॉकडाउन में लोगों ने इनकी भी सुध लेनी शुरू कर दी है। ग्रामीण घरों में इन दिनों इनका जमकर लुत्फ ले रहे हैं।
खाने में भी आया बदलाव
पीपली अहिरान की मांगी बाई बताती है कि गैस में खाना इसलिए बनता है कि जल्दी हो जाए, क्योंकि घर के आदमी बाहर जाते थे, लेकिन इन दिनों किसी को बाहर तो जाना नहीं है इसलिए ज्यादातर खाना अब हम चूल्हे में ही बनाते हैं। इसीतरह चांदी देवी ने बताया कि लॉकडाउन में उन्होंने गुड़ की लप्सी, गुड़ हलवा, मक्की की रोटी, बाजरे रोटी, गर्म छांछ, राब आदि बनाई है। उनका कहना है कि जितनी अच्छी राब चूल्हे में पकती है उतनी अच्छी गैस में कभी नहीं बनती है। बस समय ज्यादा लगता है।





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