बाड़मेर .
तपता रेगिस्तान। रेत का कण-कण अंगारा। लू भरी हवाएं और विकट मौसम। इस मौसम में जहां लोग घर से बाहर निकलने में भी हिचकिचाते है और एसी कूलर के बिना प्राण पंखेरू उडऩे की बात करते है सोचिए उस मौसम में तवे के मानिंद तपे धोरों और अंगारों की तरह धधकती जमीन पर लोग महज एक घड़ा पानी के लिए पसीने से तरबतर हों तो हालात कितने विकट होंगे? प्यासे लोगों की पानी को लेकर मेहनत ऐसी कि देखकर आंखों में पानी आ जाए।
सीमावर्ती मठाराणी गंाव में पेयजल का कोई स्रोत नहीं होने से यहां लोग मीलों दूर जाकर पानी लाते है। अकाल में वैकल्पिक इंतजाम के तौर पर पानी का टैंकर भेजा जाता है। मंगलवार को टैंकर इस गांव के लिए रवाना हुआ लेकिन खलीफे की बावड़ी से आगे जाते ही सड़क पर रेत आ गई। रेत का धोरा होने पर टैंकर चालक ने आगे जाने की स्थिति को नकार दिया। इस पर ग्रामीणों को पता चला तो उन्होंने इधर-उधर संपर्क किया। इसके बाद पत्रिका से अपनी बात बताई। पत्रिका ने सार्वजनिक निर्माण विभाग के स्थानीय अधिकारियो ंको बताया कि रेत नहीं हटी तो प्यासे लोगों तक पानी नहीं पहुंचेगा। इस पर अधिकारी-कार्मिक माने और रेत जेसीबी से हटाने लगे। करीब 18 किमी तक रेत जहां-जहां सड़क पर थी जेसीबी से हटा दी गई लेकिन आगे कच्चा रास्ता और धोरे आ गए तो कार्मिक की मशीनरी भी थक गई। यहां से मठाराणी गांव तीन किलोमीटर दूर था। अब क्या किया जाए?
प्यासों ने नहीं मानी हार
पानी का टैंकर यहां तक पहुंचने के बाद वापस लौटना ग्रामीणों के लिए बहुत बड़ी मुश्किल थी। उन्होंने तय किया कि अब वे जुटेंगे। फिर क्या था, प्यासे लोगों ने रेगिस्तान में उगी झाडिय़ों को काटकर बिछाना शुरू किया और कच्चे रस्ते को ऐसा बनाते गए कि टैंकर इस पर आगे बढऩे लगा। करीब तीन किलीमीटर तक रास्ते में जहां-जहां पर टैंकर अटका वहां ग्रामीणों ने पसीना बहाया। तीन-चार घंटे की मेहनत बाद टैकर तीन किलोमीटर का फासला तय कर गांव पहुंंचा।
पानी आते ही उत्सव
प्यासे लोगों के लिए पानी आते ही मानो उत्सव का माहौल हो गया। टैंकर से जिसके हिस्से जितना पानी आया उसको घर तक ले गए और लोगों ने राहत की सांस ली। ग्रामीणों ने कहा कि आज तो पानी आ गया है लेकिन आगे के लिए? यह समस्या तो रोज की है। सरकार हमारे लिए इंतजाम क्यों नहीं करती? पत्रिका के शुक्रगुजारग्रामीणों ने पत्रिका का शुक्रिया अदा किया। पत्रिका पानी के मुद्दे को लेकर लगातार ग्रामीणों की पीड़ा लिख रहा है, मंगलवार को भी लोगों ने पत्रिका पर भरोसा किया।
डीएनपी क्षेत्र में है समस्या
क्षेत्र का मरूउद्यान क्षेत्र(डीएनीपी) से जुड़ा इलाका पानी की विकट समस्या को झेल रहा है। यहां सड़कों पर रेत जमा होने पर उसको महीनों नहीं हटाया जा रहा है। नई सड़कों का निर्माण भी मुश्किल हो गया है। दूरस्थ ग्रामीण यहां शिकायत करने में भी मुश्किल में है। कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है। गर्मियों के दिनों में पानी को लेकर यहां पीड़ा भारी पड़ रही है।
ग्रामीणों ने कहा
इस क्षेत्र में बेरियां सूख जाने के साथ ही ग्रामीणों के समक्ष पेयजल का भारी संकट उत्पन्न हो गया। हमने स्थानीय तहसीलदार, सहायक अभियंता को ज्ञापन सौंप समाधान करने की मांग रखी। सबका आभार- गोविंदराम चौहान तहसील अध्यक्ष भाकिसं गडरारोड
आजादी के 74 वर्षों बाद भी हम मूलभूत सुविधाओं के लिए मोहताज हैं। बिजली, पानी,सड़क के अभाव में जीने को मजबूर हैं। आखिर क्या कसूर हैं हमारा? - प्रीतमराम ग्रामीण मठारानी मेघवाल





No comments:
Post a Comment